लिफ्ट लेकर 2830 किमी यात्रा

जोधपुर के दो युवकों ने महज 1900 रुपए में 2830 किलोमीटर की यात्रा 28 दिन में पूरी कर ली। वह भी हिचहाइकिंग यानि लोगों से लिफ्ट लेकर। पेशे से एडवोकेट आकाश विश्नोई और विधि के छात्र अजय मेहरा ने लिफ्ट लेकर शिमला से जम्मू तक का सफर किया। इस दौरान उन्हें बेहद रोमांचक अनुभव मिला।

आकाश ने बताया कि जोधपुर से शिमला तक 480 रुपए में ट्रेन से पहुंचे। वहां से लिफ्ट लेकर किन्नौर, स्पीति, मनाली, लद्दाख, जम्मू कश्मीर की यात्रा पर निकले। जगह-जगह लोगों से लिफ्ट मिलती रही और दोनों आगे बढ़ते रहे। वापसी में बडियाल के निकट लैंड स्लाइड के कारण कुछ दिक्कतों का सामना करना पड़ा। फिर सेना के जवानों का साथ मिलने से 35 किलोमीटर का दुर्गम रास्ता आसानी से पैदल पार कर लिया।

आकाश व अजय ने बताया कि उन्हें शुरू से ही ट्रैवल करने का बहुत शौक रहा है। वे इससे जुड़े वीडियो देखते रहते थे, ताकि लोगों के अनुभव से कुछ सीखा जा सके। हम दोनों ने तय किया कि कम से कम खर्च में कैसे यात्रा की जाए। इसके लिए हमने हिचहाइकिंग का बहुत अध्ययन किया। पूरा प्लान तैयार कर हम दोनों ने 29 मई को जोधपुर से दिल्ली की ट्रेन पकड़ी। वहां से शिमला के लिए निकले।

शिमला घूमने के बाद आगे की यात्रा के लिए दोनों हाईवे पर पहुंच गए। एक ट्रक ड्राइवर ने उन्हें लिफ्ट दी। यहां से उनकी हिचहाइकिंग शुरू हुई। लोग लिफ्ट देते रहे और वे आगे बढ़ते रहे। लोगों ने न केवल लिफ्ट दी, बल्कि कई जगह तो खाना तक खिलाया और अपने घर में भी रखा।

उन्होंने बताया कि इस यात्रा के दौरान सबसे अच्छे लोग लेह के लगे। उन्होंने दिल खोलकर जगह-जगह हमारा स्वागत किया। यहीं कारण रहा कि हमने सिर्फ पांच रात सड़क किनारे टेंट लगाकर काटी। शेष सभी रातों को लोगों ने न केवल अपने घर में शरण दी, बल्कि रात व सुबह का खाना भी खिलाया। लेह में दो स्थान पर हम लोग अपना कुछ सामान लोगों के यहां भूल आए। उन लोगों ने कुछ किलोमीटर की यात्रा कर हमारा सामान तक वापस पहुंचाया। स्पीति में स्थानीय लोग उन्हें अपने यहां के रीति-रिवाज से अवगत कराने के लिए एक शादी समारोह में ले गए।

आकाश और अजय ने बताया कि आतंकवाद का खौफ कश्मीर के लोगों के चेहरों पर साफ पढ़ा जा सकता है। बहुत खुशमिजाज और हमेशा मदद को आगे रहने वाले कश्मीरी लोगों के मन में आतंकवादियों का भय समाया हुआ था। इस कारण वे लिफ्ट देने से भी कतराते थे। हम लोगों को कुछ स्थानीय दोस्तों ने चेता दिया था कि यहां पर सिर्फ सेना के वाहनों से लिफ्ट लेना ही सुरक्षित रहेगा। ऐसे में हमने सेना के जवानों को ही प्राथमिकता दी। उन्होंने बताया कि लद्दाख-श्रीनगर मार्ग पर पत्थर साहेब गुरुद्वारा है। इसका रखरखाव सेना करती है। हम यहां पर दो दिन ठहरे। यहां हमें किसी प्रकार की दिक्कत नहीं आई। सेना के जवानों ने घर के समान माहौल प्रदान किया।

वापसी के दौरान जम्मू के रास्ते में बडियाल टनल पर लैंड स्लाइड होने से रास्ता जाम हो गया। 24 घंटे तक दोनों वहां अटके रहे। इस दौरान उन्हें सेना के नौ जवान मिले। वे सभी छुट्‌टी पर घर जा रहे थे। ऐसे में जवान अपनी छुट्‌टी का एक दिन भी रास्ता बंद होने के नाम पर कुर्बान करने को तैयार नहीं थे। जवानों ने स्थानीय लोगों से वैकल्पिक रास्ता पूछा। हम दोनों भी उन जवानों के साथ पैदल निकल पड़े।

घने जंगल से होकर पांच किलोमीटर का पहाड़ी सफर उन्होंने साढ़े तीन घंटे में पूरा किया। आगे पहुंचे तो फिर रास्ता बंद मिला। लोगों ने बताया कि 35 किलोमीटर की दूरी में करीब दस स्थान पर लैंड स्लाइड हो रखा है। रास्ता खुलने में काफी समय लग सकता है। ऐसे में वे पैदल ही चल पड़े। रात साढ़े दस बजे रामबाण पहुंचे। वहां से सेना की एक वैन के जरिए जम्मू पहुंचे।

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