मरने निकले निःसंतान बुजुर्ग दम्पत्ति को बचाया

बुजुर्ग बाबू सिंह (82) और छोटी देवी (80) जिंदगी के अकेलेपन से परेशान होकर सुसाइड करने निकले। अलवर के हसन खां मेवात नगर में दोनों बुजुर्ग रेल पटरी पर लेट भी गए। कभी ट्रैकमैन मुकेश की निगाह उन पर पड़ी। वह तेजी से बुजुर्ग जोड़े की तरफ दौड़ा। उसके साथी कुछ समझे, उससे पहले जोर-जोर से आवाज आती है…हटो..हटो..ट्रेन आ रही है। मुकेश के कुछ साथी भी उस दिशा में दौड़े। मुकेश ने धीमी गति से आती ट्रेन के लोको पायलट को रुकने का इशारा किया। फिर बुजुर्ग दम्पत्ति के पास पहुंच कर उन्हें ट्रैक से हटाया।

दंपत्ति ने बताया कि वे भरतपुर के कुम्हेर के किशनपुरा गांव के रहने वाले हैं। उनकी कोई संतान नहीं है। ऐसे में अलवर शहर में ही करीब दस साल पहले आकर रहने लगे। पास में ही झुग्गी बनाकर अपना ठिकाना बना लिया। बाबू सिंह ने मुकेश को बताया कि वह चौकीदारी का काम करते हैं। उम्र के इस पड़ाव में उन्हें संभालने वाला कोई नहीं है और अब वे चौकीदारी कर थक चुके हैं। उन्हें लगा कि दोनों में से यदि किसी एक की पहले मौत हो गई, तो उनका जीवन आगे कैसे निकलेगा। ऐसे में दोनों ने साथ में मरने की सोची।

बाबूसिंह बोले- चौकीदारी का काम करने का दम नहीं रहा है। हमारा अपना कोई नहीं है। न संतान है, न अपने परिवार का कोई चाहता है। किशनपुरा गांव में उनके चाचा-ताऊ के परिवार हैं, लेकिन उनकी कोई संतान नहीं है। न अब खुद का घर है, न कोई उनको संभालने वाला। इसलिए उम्र के आखिरी पड़ाव में दोनों एक साथ भगवान के घर जाने के लिए पटरी पर आकर लेट गए।

बुजुर्ग को रेलवे की पटरी से हटाने के बाद सामाजिक कार्यकर्ता अश्वनी जावली को सूचना मिली। वह उन्हें डबल फाटक के पास स्थित गुरुनानक आसरा वृद्धाश्रम ले गए। यहां दोनों को रखा गया है। जावली ने बताया कि हमनें बुजुर्गों की काउंसिलिंग की है। हमने कह दिया कि आपके हम बच्चे हैं। बुजुर्ग हेल्पलाइन ऐसे लोगों के लिए काम करती है। मैं भी उसका हिस्सा हूं।

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