सिर्फ प्रचार, काम नहीं

अब मीडिया शुद्ध व्यवसायी तो राजनेता सत्ता-पिपासू बन गए हैं। मीडिया को बेहिसाब पैसे कमाने हैं। इसके लिए मैनेज होने या गोदी बनने में उसे जरा भी संकोच नहीं रहा। राजनेता कुर्सी के लिए गोदी मीडिया पर राजकाज तक का पैसा लुटाकर उसका भरपूर दोहन कर रहे हैं। कीमत जन-विकास को चुकानी पड़ रही है।सरकारी विज्ञापनों की रेवडिय़ां बांटे जाने के रिकॉर्ड, साल दर साल … Continue reading सिर्फ प्रचार, काम नहीं

आकाश से गिरे खजूर पे अटके

— अनिल चतुर्वेदी उम्मीद नहीं थी…कि कोरोना दौर की पीड़ा से बड़ी पीड़ा उसके बाद झेलनी पड़ेगी। एक वायरस ने हमारे रौंगटे खड़े कर दिए तो दूसरे वायरस ने महफूज बने रहने की खुशी हमसे छीन ली। राजतंत्र कोरोना से जन-बचाव के भरसक प्रयास कर रहा है, लेकिन साथ ही साथ कंगाली की पटकथा भी लिख डाली है। तभी तो सालभर के खौफनाक दौर में … Continue reading आकाश से गिरे खजूर पे अटके

वैक्सीन से कैसा भय

– अनिल चतुर्वेदी – मानना पड़ेगा कि कोरोना से निजात पाने में भारत के प्रयास काफी प्रभावी साबित हो रहे हैं। हमने इस वायरस को पश्चिमी देशों की भांति बेकाबू नहीं होने दिया। अब इसके खत्मे के लिए असरकारी वैक्सीन तैयार कर ली है। कामना यही है कि वैक्सीन ऐसा असर दिखाए कि कोरोना भाग छूटे, हमेशा के लिए। लोगों को वैक्सीन लगाने का व्यापक … Continue reading वैक्सीन से कैसा भय

बरस बीता, वक्त नहीं

– अनिल चतुर्वेदी – चल हट 2020….ये झिडक़ी इस महीने एफएम रेडियो पर खूब सुनने को मिली। दुनियाभर में साल 2020 को लेकर लोगों में नाराजगी, नफरत साफ देखी जा रही है। अब इसकी बिदाई हो रही है तो आने वाला साल खुशियों से भरा होने की कामना हरकोई कर रहा है। साल 2020 ने ऐसे तेवर दिखाएं हैं कि लोग तौबा कर बैठे। मार्च … Continue reading बरस बीता, वक्त नहीं

अवसाद का कोढ़

अनिल चतुर्वेदी कोरोना वायरस के खौफ से घरों में दुबकने को मजबूर लोग मानसिक संतुलन खो रहे हैं, ऐसा तो नहीं कहा जा सकता। मगर वे अवसाद ग्रस्त जरूर होते जा रहे हैं। अमीर-गरीब हर तबका इसकी चपेट में आए चला जा रहा है। अपने वर्तमान और भविष्य को लेकर तो लोग बहुत पहले से ही चिंता में हैं, अब इस विकट काल में जान-पहचान … Continue reading अवसाद का कोढ़

बदलाव खुद में भी जरूरी

— अनिल चतुर्वेदी — हाड़-मांस की दुर्गा मां की अस्मिता पर बार-बार हो रहे हमले से व्यथित होकर इस बार हमने पत्रिका का प्रमुख मुद्दा महिलाओं के हाल को ही बनाया है। मुद्दा आलेख भी सिर्फ महिलाओं ने ही तैयार किए हैं। उन्होंने स्त्री मनोदशा को हूबहू व्यक्त करने की पूरी कोशिश की है। समस्या के विभिन्न पहलुओं पर लेखनी चलाई है, लेकिन समस्या खड़ी … Continue reading बदलाव खुद में भी जरूरी

गजब धोनी, अजब बिदाई

— अनिल चतुर्वेदी — पता नहीं कैसे इस क्रिकेटर से आमजन को इतना लगाव हो गया। जुनूनी लगाव। उसके बारे में कुछ भी उल्टा-सीधा सुनना नहीं। कोई खामी निकाले तो उसके पीछे हाथ धो कर पड़ जाना। जब मैदान पर उतरे तो उसके नाम से पूरा स्टेडियम गूंज उठना। खेले तो बस, फैन्स की दीवानगी की सारी हदें पार हो जाना। यहां बात हो रही … Continue reading गजब धोनी, अजब बिदाई

सियासत में बुजुर्ग कब तक?

— अनिल चतुर्वेदी — वंशवाद व्यवसाय में सफल होता है, लेकिन लोकतांत्रिक राजनीति में बिलकुल ही नहीं। कांग्रेस इसकी जीती-जागती मिसाल है। वंशवाद के चलते भारत की सबसे पुरानी यह पार्टी रसातल की ओर तेजी से लुढक़ रही है। हालात ये हो चले हैं कि वंशवादी नेतृत्व कामजोर होने के कारण पार्टी को सही दिशा और नई ऊर्जा नहीं मिल पा रही है। नेतृत्व के … Continue reading सियासत में बुजुर्ग कब तक?

कड़वी हकीकत उजागर

— अनिल चतुर्वेदी — देश में हुए लॉकडाउन से कोरोना वायरस का फैलाव तो थमा नहीं, पर दो कड़वी हकीकत उजागर हो गईं। एक तो राजतंत्र की जनसेवा का आडंबर पूरी तरह से बिखर गया। दूसरा, चिकित्सा क्षेत्र के निजीकरण की असलियत सामने आ गई। वैसे तो कोरोना संक्रमण रोकने के लिए ही देशभर की घरबंदी की गई थी, लेकिन अनलॉक करते ही जिस तेजी … Continue reading कड़वी हकीकत उजागर

दो नहीं एक भारत

— अनिल चतुर्वेदी —कांग्रेस नेता एवं जाने-माने वकील कपिल सिब्बल ने हाल ही में कहा कि देश में दो भारत बन चुके हैं। एक वो जो कोरोना लॉकडाउन के दौरान घर में अंत्याक्षरी खेलता है, पालतू जानवरों के साथ वक्त बिताता है, रामायण देखता, थाली-घंटी बजाता और अंधेरे में मोमबत्ती जलाता है। दूसरा भारत, बेरोजगार होकर सड़कों पर उतरता है, जेब में थोड़े से पैसे, … Continue reading दो नहीं एक भारत