चिंगारी न भडक़े

— अनिल चतुर्वेदी —

नागरिक(संशोधन) बिल-2019 (सीएबी) को लेकर अचानक देशभर में आग भडक़ गई। बिल पर अल्पसंख्यकों की नाराजगी तो समझ में आती है, लेकिन युवा वर्ग के आक्रोशित होने की वजह केवल यह बिल नहीं हो सकती। उनके भीतर बेरोजगारी और अनिश्चित भविष्य को लेकर खदबदा रही ज्वाला बिल विरोध के बहाने बाहर निकली है। अब यदि मंदी औऱ मंहगाई से परेशान आमजन भी इस विरोध में कूद पड़े तो ताज्जुब नहीं होगा।

हम तो चाहेंगे कि प्रधानसेवक की सरकार जितना जल्दी हो सके इस आग पर काबू पाने की कोशिश करे। सरकार फिलहाल राष्ट्रवाद, मंदिर, पाकिस्तान, नेहरू-गांधी आदि मुद्दों को उठाकर लोगों को बरगलाने से बाज आए। क्योंकि मंदी, मंहगाई और बेरोजगारी ने हालात बद से बदतर करने शुरू कर दिए हैं। आमजन और युवाओं के पेट पर आन पड़ी है। वे गणमान्यों की तरह सिर्फ मुखर होकर मन हल्का नहीं करेंगे, बल्कि सडक़ों पर उतरकर उग्र रूप धारण करेंगे। इन्हें केवल चिंगारी चाहिए, आग तो खुद ब खुद लग जाएगी। इस समय सीएबी ने चिंगारी का काम किया है। ऐसे में भी प्रधानसेवक और उनकी टीम, विपक्ष पर दोषारोपण तथा आसमान छूता मंदिर बनाने की बात करते रहे तो स्थिति अनियंत्रित हो सकती है।

स्थिति पर काबू पाने के लिए यदि हथौड़ा चलाया गया या फिर आपातकाल के जरिए विरोध कुचलने की कोशिश की गई तो इस सख्ती का हश्र 1975-77 के आपातकाल में तलाशा जा सकता है।     

प्रस्तुत अंक में देश की राजधानी से शिक्षा व्यवस्था में जबरदस्त सुधार की हुई शुरूआत को मुद्दा बनाया गया है। दिल्ली की आप सरकार ने अपने राज्य में शिक्षा को सस्ता और उच्च स्तरीय बनाने का दुर्लभ काम किया है। यह उपलब्धि शिक्षा माफिया की दादागीरी के जवाब में हासिल की गई है। दिल्ली के सरकारी स्कूलों का जो कायाकल्प हुआ है, उससे निजी क्षेत्र की स्कूली दुकानें संकट में आ जाने की चर्चा खूब हो रही है।

ऐसा नहीं है कि सरकारी स्कूलों की शिक्षा का स्तर ऊंचा होना ऐतिहासिक घटना है। पहले भी सरकारी स्कूल, कॉलेज अपनी गुणकारी शिक्षा के लिए जाने जाते रहे हैं। तब गवर्नमेंट इंटर कालेज (जीआईसी) में दाखिला पाना चुनौतीभरी कवायद होती थी। जीआईसी की पढाई आला दर्जे की थी। ये तो लालची राज-नेता और नौकरशाहों ने शिक्षा माफिया के मोहपाश में जकड़ कर बेड़ा गर्क किया है। माफिया के अनुकूल कानून बनाकर तथा फैसले लेकर सरकारी शिक्षा तंत्र को नष्ट-भ्रष्ट किया गया है।

दिल्ली सरकार ने सरकारी शिक्षा के स्वर्णिम काल को ही पुनर्जीवित किया है। उसने जता दिया कि राज की इच्छा शक्ति से पत्थर को भी हीरा बनाना संभव है। शिक्षा आज भी सस्ती और गुणवत्ता से भरपूर हो सकती है। बस, ऐसा कर दिखाने का जुनून होना चाहिए। दिल्ली सरकार ने केन्द्र तथा सभी राज्यों को राह दिखाई है। अब देखना यह होगा कि स्थापित नेता जमात का हृदय परिवर्तन कब होता है। कब वो लालच छोड़ देश के नौनिहाल की भलाई पर फोकस करेंगे।   

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