गर्मी की बुरी मार झेल सकता है भारत

अगले दो से चार दशक के बीच भारत गर्मी की बुरी मार झेलेगा, जिससे रहना मुश्किल हो जाएगा। यह चिंता जलवायु परिवर्तन पर आई एक रिपोर्ट में जताई गई है। इंग्लैंड के ग्लासगो शहर में हुए जलवायु परिवर्तन सम्मेलन के मौके पर आई इस रिपोर्ट में कहा गया है कि अगले 25 सालों, यानी 2036 से 2065 के बीच भारत भीषण गर्मी की मार झेल सकता है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि अगर कार्बन उत्सर्जन की यह दर बनी रही तो ऐसी स्थिति देखनी पड़ सकती है। रिपोर्ट के बारे में इटली के इंटर गॉवर्मेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज (आईपीसीसी) ने कहा है कि जलवायु परिवर्तन का जी-20 सहित तमाम देशों पर असर पड़ेगा। रिपोर्ट को 40 वैज्ञानिकों की टीम ने तैयार किया है। ये सभी वैज्ञानिक यूरो-मेडिटेरियन सेंटर ऑन क्लाइमेंट चेंज से जुड़े हैं।

रिपोर्ट के अनुसार बीते 20 साल में जी-20 देशों में लू की वजह से होने वाली मौतों में 15 फीसदी का इजाफा हुआ है। जंगलों में आग के कारण कनाडा के क्षेत्रफल से डेढ़ गुना अधिक क्षेत्र में वन तबाह हो गए। समुद्र का जल स्तर बढ़ने के साथ स्वच्छ पानी की उपलब्धता भी प्रभावित हुई है। इस कारण डेंगू से लेकर लू से बड़ी संख्या में लोगों की जान गई है। इसमें यह भी कहा गया है कि जी-20 देशों में जीवन का ऐसा कोई पहलू नहीं रहा, जिसपर जलवायु परिवर्तन का असर न पड़ा हो।

रिपोर्ट में कहा गया है कि आपात स्थिति में अगर कार्बन उत्सर्जन में कटौती के इंतजाम नहीं किए जाते हैं तो अगले 30 सालों में दुनिया की सभी बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में संकट पैदा हो सकता है। इस कारण सूखा, लू और समुद्र के जल स्तर बढ़ने का खतरा काफी बढ़ सकता है। साथ ही खाद्यान्नों की आपूर्ति प्रभावित होगी और पर्यटन पर बुरा असर पड़ेगा। इससे दुनिया का कोई भी देश बच नहीं पाएगा। रिपोर्ट में कहा गया है कि जी-20 के देश दुनिया में कुल कार्बन उत्सर्जन के 80 फीसदी खुद पैदा करते हैं। ऐसे में दुनिया को बचाने और कार्बन उत्सर्जन में कटौती के लिए इन्हें तुरंत कदम उठाना चाहिए।

जलवायु परिवर्तन का भारत पर सबसे बुरा असर पड़ने की आशंका है। क्योंकि इसकी भौगोलिक स्थिति सबसे अलग है। एक तरफ इसकी 7500 किमी तटीय सीमा है तो दूसरी तरफ इसके उत्तर में हिमालय है। भारत के 54 फीसदी इलाके में भीषण गर्मी पड़ती है। ऐसे में इस देश को सबसे ज्यादा खतरा है। रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत अगर नहीं चेतता है तो आने वाले वर्षों में यहां चलने वाली लू में भारी वृद्धि होगी और यह अवधि 25 गुना तक बढ़ सकती है। अगर वैश्विक स्तर पर तामपान में दो डिग्री की बढ़ोतरी होती है तो भारत में लू चलने की अवधि में पांच गुना तक की वृद्धि हो सकती है।

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