योजना नहीं, ब्रांडिंग के लिए विज्ञापन की रेवडिय़ां

– प्रेसवाणी डेस्क –

सरकारी विज्ञापनों में भयंकर अंधेरगर्दी चल रही है। लगभग समूचा मीडिया जगत कारोबारियों की गिरफ्त में आ जाने से राजतंत्र के लिए उसे मैनेज करना आसान हो गया है। मैनेज करने का प्रमुख जरिया प्रचार सामग्री बन गई है। लिहाजा केन्द्र और राज्य सरकारें बगैर बजटीय सीमा तय किए विज्ञापन की रेवडिय़ां बांटकर मीडिया को गोदी बनाए जा रही हैं।
यह राय खुद राजनेता तथा विज्ञापन एजेंसिंयों के प्रबंधक व्यक्त कर रहे हैं। राजस्थान के वित्त मंत्री रह चुके प्रद्युम्न सिंह के अनुसार मीडिया को सरकारी विज्ञापनों का बजट ही तय नहीं किया जाता। सरकार जरूरत के मुताबिक प्रिंट तथा इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को विज्ञापन जारी करती रहती हैं। पैसे की कमी पडऩे पर विधानसभा से सप्लीमेंटरी बजट पास करवा लिया जाता है। ताकि जनकल्याण की योजनाओं के कथित प्रचार में अटकाव पैदा न होने पाए।
कुछ इसी तरह की राय एक्यूरेट एडवर्टाइजिंग कंपनी के पूर्व एमडी सुभाष बाफना व्यक्त करते हैं। वह कहते हैं कि निजी कंपनियां अपने उत्पाद के कुल मार्केटिंग बजट का केवल 5-10 फीसदी विज्ञापन पर खर्च करती हैं। किंतु सरकार में ऐसी कोई भी सीमा तय नहीं की जाती है। पहले सरकारी विज्ञापनों का उद्देश्य विकास योजनाओं के प्रति लोगों को जागरूक करना था, लेकिन अब शुद्ध रूप से भी ब्रांडिंग के लिए विज्ञापन जारी किए जाते हैं। इसके लिए कोई नियम-कानून नहीं हैं। किसी न किसी योजना या कार्यक्रम के नाम पर विज्ञापन जारी कर नेतागण खुद की ब्रांडिंग बेरोक-टोक करते हैं। मतलब, जनता का पैसा अपने पर लुटाया जा रहा है।

ब्रांडिंग का फेर
सरकारी कार्यक्रम तथा विकास योजनाओं की आड़ में अपनी छवि निखारन ेके मकसद से पहले हर सरकारी विभाग के विज्ञापन में उस महकमे के मंत्री तथा विभागाध्यक्ष तक की तस्वीर लगाई जाती थी, लेकिन कुछ साल पूर्व सुप्रीम कोर्ट द्वारा दी गई व्यवस्था के बाद से केवल सरकार प्रमुखों की फोटो लगे विज्ञापन जारी होने लगे हैं। सो अब प्रधानमंत्री औऱ मुख्यमंत्री विज्ञापन के जरिये खुद की ब्रांडिंग करने लगे हैं।
छवि चमकाने के फेर में राजनेताओं के फोटो लगे विज्ञापनों के अलावा दो-तीन पृष्ठीय परिशिष्ट तक जारी किए जाने लगे हैं। इनमें ऐसा नजारा पेश किया जाता है, मानो केवल अमुक नेता ने ही विकास की गंगा बहाई है। इनसे पहले देश, प्रदेश उजाड़ पड़ा था। मतलब, परिश्ष्टि में दिख रहे राज-पुरुष, इंसान नहीं दैवीय-शक्ति सम्पन्न महापुरुष हैं। लिहाजा ये पूज्य हैं, इन्हें सिर-आखों पर बिठाकर ही जनता का कल्याण संभव है।
प्रचार-प्रसार की इस नई परिपाटी में कोई भी योजना कितनी भी महत्वपूर्ण हो, उसकी ईमानदार क्रियान्विती की बजाय केवल ढोल पीटना, मौजूदा राज में मायने रखने लगा है। खूब गाल बजाओ, चर्चा करो-जिससे जनता को लगे कि काम हो रहा है। सरकार बैठी नहीं है, बल्कि सक्रिय है। गोया कि सरकारी सक्रियता का भ्रमजाल फैला दिया गया है।
नेताओं के ब्रांडिंग मोह में फंसकर एक बहुत ही महत्वपूर्ण योजना ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ के दम तोडऩे की कड़वी हकीकत से ही राज की असल मंशा का अंदाजा लगाया जा सकता है। यह योजना देश की उस समस्या के निदान के लिए वर्ष 2015 में लागू की गई, जो आधी आबादी से ताल्लुुक रखती है। कन्याभ्रूण हत्या, मासूम बच्ची से बलात्कार के बाद हत्या, बाल विवाह औऱ घरेलू हिंसा आदि में बढ़ोत्तरी थामने के लिए सरकार की यह योजना मील का पत्थर साबित हो सकती थी। मगर सरकार के प्रचार तंत्र ने समूची योजना में पलीता लगाने की ठान ली। कहते हैं न कि, झूठ के पक्ष में इतना हल्ला मचाओ कि वह सच लगने लगे।

योजना नेपथ्य में
यही काम सरकार करती दिख रही है। उसने ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ योजना के पेटे इतने सालों में जितना बजट आवंटित किया, उसका 50 से 80 फीसदी तक इस योजना के प्रचार पर खर्च कर दिया। मगर न बेटियां बचाई जा सकीं हैं, न ही उन्हें आशानुरूप शिक्षित बनाया जा सका है, खासकर ग्रामीण अंचल में। हाल ये है कि बेटियों की दशा तो नहीं सुधार रही, लेकिन नेताओं की प्रचार भूख के कारण मीडिया जगत चांदी कूट रहा है।
प्राप्त आंकड़ों पर नजर डालें तो केंद्र सरकार द्वारा 2015 में शुरू की गई बेटी ‘बचाओ, बेटी पढ़ाओ (बीबीबीपी)’ योजना के तहत 80 फीसदी धनराशि विज्ञापन पर खर्च की गई है। गौर करने वाली बात ये है कि हीना विजयकुमार गावित की अध्यक्षता में ‘बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ’ के विशेष संदर्भ के साथ शिक्षा के जरिये महिला सशक्तिकरण के शीर्षक के तहत एक रिपोर्ट को लोकसभा में पेश किया गया। रिपोर्ट में कहा गया कि सरकार को लड़कियों के स्वास्थ्य और शिक्षा क्षेत्र में भी निवेश करना चाहिए और उस पर ध्यान देना चाहिए। इसी रिपोर्ट में खुलासा किया गया कि 2016-2019 के दौरान जारी किए गए कुल 446.72 करोड़ रुपयों में से 78.91 फीसदी धनराशि सिर्फ मीडिया के जरिये प्रचार करने में खर्च की गई। समिति ने योजना के 2014-15 में शुरुआत के बाद से कोविड प्रभावित वर्ष को छोडक़र अब तक आवंटित राशि का राज्यों द्वारा केवल 25.15 प्रतिशत खर्च करने को ‘दुखद’ बताया है और कहा है कि यह उनके खराब ‘कार्य निष्पादन’ को प्रदर्शित करता है। रिपोर्ट में बताया गया कि चंडीगढ़ एवं त्रिपुरा ने इस निधि का शून्य प्रतिशत खर्च किया, जबकि बिहार ने करीब छह प्रतिशत खर्च किया। समिति को यह देखने को मिला कि योजना की शुरुआत के बाद से कोविड वाले वर्ष 2019-20 और 2020-21 को छोडक़र ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ (बीबीबीपी) योजना के तहत कुल बजट आवंटन 848 करोड़ रुपये था और उक्त अवधि में राज्यों को 622.48 करोड़ रुपये जारी किए गए थे। समिति ने तय निधि की केवल 25.15 प्रतिशत राशि अर्थात 156.46 करोड़ रुपये खर्च किया जाना अत्यधिक आश्चर्य एवं दु:ख का कारण माना।
रिपोर्ट के अनुसार समिति को यह देखकर अत्यधिक निराशा हुई कि किसी भी राज्य ने ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ निधियों को प्रभावी ढंग से उपयोग करने में सराहनीय प्रदर्शन नहीं किया है। समिति ने इस बात पर हैरत जताई है कि ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ के तहत शिक्षा, स्वास्थ्य और अन्य कार्यों के संबंध में राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों द्वारा किए गए खर्च के बारे में अलग-अलग सूचना नहीं है। वर्तमान में इस योजना को देशभर के 405 जिलों में लागू किया जा रहा है। समिति ने बताया कि 2014-2015 से 2019-2020 तक इस योजना के तहत कुल बजटीय आवंटन 848 करोड़ रुपये था। इस दौरान राज्यों को 622.48 करोड़ रुपये की धनराशि जारी की गई, लेकिन इनमें से सिर्फ 25.13 फीसदी धनराशि (156.46 करोड़ रुपये) ही राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों द्वारा खर्च की गई।

सिर्फ प्रचार, बाकी नाममात्र
पिछले साल जनवरी माह में केंद्रीय महिला एवं बाल विकास राज्य मंत्री डॉ. वीरेंद्र कुमार ने लोकसभा में दिए अपने जवाब में बताया था कि ‘बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ’ के तहत पिछले चार सालों में आवंटित हुए कुल बजट का 56 फीसदी से अधिक पैसा यानी कि 364.66 करोड़ रुपये ‘मीडिया संबंधी गतिविधियों’ पर खर्च किए गए। चौंकाने वाली बात तो ये है कि योजना की 19 फीसदी से अधिक धनराशि जारी ही नहीं की गई।
वर्षवार आंकडों को देखें को साल 2018-19 के लिए सरकार ने 280 करोड़ रुपये आवंटित किए थे, जिसमें से 155.71 करोड़ रुपये केवल मीडिया संबंधी गतिविधियों पर खर्च कर दिए। इनमें से 70.63 करोड़ रुपये ही राज्यों और जिलों को जारी किए गए, जबकि सरकार ने 19 फीसदी से अधिक की धनराशि यानी 53.66 करोड़ रुपये जारी ही नहीं किए। इसी तरह, साल 2017-18 में सरकार ने 200 करोड़ रुपये आवंटित किए थे, जिसमें से 68 फीसदी धनराशि यानी 135.71 करोड़ रुपये मीडिया संबंधी गतिविधियों पर खर्च की गई थी। वहीं साल 2016-17 में सरकार ने 29.79 करोड़ रुपये मीडिया संबंधी गतिविधियों पर खर्च कर दिए, जबकि केवल 2.9 करोड़ रुपये ही राज्यों एवं जिलों को बांटे गए। देखा जाए तो ये हाल सिर्फ एक योजना का नहीं, बल्कि सभी सरकारी योजनाओं का है। केन्द्र व राज्य लगभग सारी योजनाएं अपने-अपने सत्ताधारियों की ब्रांडिंग के लिए ही लाए ही जा रही हैं।

विज्ञापन की बैसाखी – खबरें, कार्यक्रम
न्यूज, फिल्म तथा विभिन्न कार्यक्रम ही विज्ञापन के सहारा हैं। चाहे अखबार हों या टीवी चैनल, इनके समाचारों और अन्य कार्यक्रमों के ही पाठक, दर्शक होते हैं। उनके बीच कंपनियां अपने उत्पादों को विज्ञापन के जरिये प्रमोट करती हैं। दुनियाभर में ऐसा कोई भी अखबार अथवा टीवी चैनल नहीं है, जो केवल विज्ञापन के लिए बना हो।
एक्यूरेट एडवर्टाइजिंग के सुभाष बाफना कहते हैं कि केवल विज्ञापनों के अखबार कहीं नहीं प्रकाशित होते हैं। उन्होंने गुजरात में एक अखबार ऐसा देखा जरूर है, लेकिन वह भी समाचार-पत्रों में ‘इन्सर्ट’ किया जाता है। ताकि अखबारी पाठकों तक पहुंच बना सके। अकेले उस विज्ञापन अखबार का कोई लेवाल नहीं है।

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