जो गलत है, सो है

— अनिल चतुर्वेदी

निजाम बदलने के साथ ही शासन की प्राथमिकताएं और नीतियां कितनी तेजी से बदलती हैं, ये हमने मात्र एक दशक में ही अनुभव कर लिया है। आपको क्रिकेट का इंडियन प्रीमियर लीग (आईपीएल) का 2013 का सीजन तो याद ही होगा। जब कई खिलाड़ी स्पॉट फिक्सिंग में फंसे थे। तब खेलों में सट्टे और जुए का मुद्दा खूब गरमाया था। तत्कालीन सरकार को सट्टे का नासूर दूर करने के लिए कड़े कानूनी प्रावधान करने पड़े थे।

किंतु वर्तमान में वहीं नासूर अल्लान तरीके से देशवासियों को कितनी तेजी से गिरफ्त में ले रहा है, ये हम सब देख रहे हैं। इसका कारण कि नए निजाम को खेलों में सट्टेबाजी और जुए से जरा भी गुरेज नहीं है, ऐसा प्रतीत होता है। क्रिकेट के प्रति लोगों की दीवानगी को किन-किन तरीकों से कमाई के स्रोत में बदला जाए, इस पर मौजूदा खेल प्रशासकों का पूरा जोर है। उन पर ऊपर वालों का वरदहस्त दिखता है। तभी तो तमाम ऑनलाइन फैंटेसी गेमों के जरिये सट्टे और जुए का खुला खेल चल रहा है, और किसी प्रकार की रोक या टोक नहीं हो रही है। यदि कोई राज्य सरकार अथवा अदालत रोकने की कोशिश कर रही है तो उनकी कवायद में रोड़ा अटकाने के लिए ऊपरी अदालतें शासन की सहयोगी बनती दिख रही हैं। न्यायपालिका का सम्मान करना हमारा कर्तव्य है, लेकिन एक बुराई को लेकर भ्रमित अदालती फैसले पर टिप्पणी भी तो कर्तव्य पालन का हिस्सा है।

भारत में अभी भी ब्रिटिश काल के कानून प्रभावी हैं, जिसमें सट्टे और जुआघरों पर तो रोक का प्रावधान है, लेकिन कौशल आधारित खेल पर छूट है। इसी वजह से भारतीय कानून में ऑनलाइन गेम्स को कौशल आधारित के खेल या किस्मत का खेल बताने की स्पष्ट व्याख्या नहीं है। ये खामी सटोरियों तथा ऑनलाइन गेमिंग को बढ़ावा दे रही है। कर्नाटक में ऑनलाइन गेम पर सरकार ने रोक लगाने के नियम बनाए तो सुप्रीम कोर्ट तक ने ऑनलाइन गेमिंग को कौशल का खेल बताकर कर्नाटक सरकार के प्रयासों पर पानी फेर दिया।  जबकि ऑनलाइन खेल खिलाने वाली कंपनियां खुद अपने विज्ञापनों में गेम की लत न पडऩे का आग्रह करती हैं। यदि ये कौशल का खेल है, तो आगाह करने की क्या जरूरत है।

आश्चर्य  इस बात का है कि जिन विकसित देशों में खेलों में ‘बैटिंग’ को कानूनी संरक्षण मिला हुआ है, अब वहां भी अब खिलाडिय़ों को जुए का प्रचार करने वाले विज्ञापन करने से रोका जा रहा है। जुआ सिखाने के विज्ञापन पर प्रतिबंध लगाया जा रहा है। मगर भारत में उसके ठीक उलट क्रिकेट खिलाड़ी और फिल्मी सितारे बेरोकटोक फैंटेसी गेमों का प्रचार कर विज्ञापन मानकों का उल्लंघन कर रहे हैं।

इस समय ऑनलाइन गेमिंग के नाम पर देश में जो खेल चल रहा है, उसने नागरिकों को बर्बादी के मुहाने पर ला खड़ा किया है। इसी चिंता को ध्यान में रखकर इस अंक में नुमाइशी गेमिंग के खतरों पर प्रमुख रूप से चर्चा की गई है। इसी के साथ आशा भी की गई है कि लोग ऑनलाइन गेम के मकडज़ाल से बाहर निकलने का मन जल्दी बनाएंगे। उनको यह फैसला स्व-विवेक से लेना होगा। क्योंकि खेल जगत के जिम्मेवार तथा राज की ओर से फिलहाल कोई प्रतिबंध जैसी कार्यवाही किए जाने की उम्मीद बहुत कम है।

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