सीएम की सियासत में अटके थर्डग्रेड टीचर तबादले

राजस्थान में शिक्षकों के तबादले राजनीतिक नफा-नुकसान पर आ टिके हैं। इसलिए 24×7 राजनीति में रमे मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने इस मसले को अपने हाथ में ले लिया है। अब वहीं तय करेंगे कि तबादले वाकई खोले जाएं या सिर्फ घोषणा मात्र से आकांक्षियों को तब तक आटकाए रखा जाए जब तक सियासी मकसद न पूरा हो। ऐसे में वो फिलहाल तबादलो को लेकर कुछ भी करने के मूड में नहीं हैं। वो इंतजार कर रहे हैं मसला गरमाने का। तबादले की मांग तो लंबे समय की हो रही है, लेकिन दबाव का रंग नहीं जम पा रहा है। दबाव चरम पर पहुंचे तो मुख्यमंत्री अहसान लादने की स्थिति बनाएं। तब वो शिक्षकों, उनके नेताओं, विधायकों आदि से कह सकेंगे कि सिर्फ उनके दबाव के चलते तबादले खोले जा रहे हैं। गोया कि मुख्यमंत्री तबदलों से भी उसी तरह का सियासी फायदा लेना चाह रहे हैं, जैसा ओल्ड पेंशन स्कीम लागू करके उन्हें मिला है।

प्रदेश में शिक्षकों, खासकर थर्ड ग्रेड शिक्षकों के तबादले कई वर्षों से नहीं हुए हैं। इनमें भी ट्राइबल क्षेत्र से नॉन-ट्राइबल क्षेत्र में तबादले तो वैसे भी प्रतिबंधित हैं। वर्ष 2018 में थर्ड ग्रेड टीचरों के तबादले किए गए थे। उसके बाद से अघोषित रोक लगी हुई है। मांग लगातार हो रही है, लेकिन सरकार किसी न किसी बहाने तबादले टाल रही है। पिछले शिक्षा मंत्री गोविंदसिंह डोटासरा के समय थर्ड ग्रेड टीचरों से तबादले हेतु आवेदन मांगे गए थे। किंतु उस समय भी ट्राइबल क्षेत्र से तबादलों पर सरकार ने कोई स्पष्ट निर्णय नहीं लिया। उनके अलावा जो करीब 80 हजार आवेदन आए, उन्हें भी यह कहकर अटका दिया गया कि सरकार नई नीति लेकर आ रही है। उसी के अनुरूप आगे तबादले किए जाएंगे।

सरकार की टरकाऊ नीति से तो लगता है वो थर्ड ग्रेड टीचरों को और पकाना चाहती है। जब विरोध की आग धरने-प्रदर्शन तक पहुंच जाएं, तब तबादले का पिटारा खोला जाए। उस समय भी सरकार ट्राइबल क्षेत्र के टीचरों को तो बिलकुल भी उपकृत नहीं करना चाहती है। मतलब, कर्मचारियों के बीच ‘डार्क जोन’ कहलाए जाने वाले ट्राइबल क्षेत्र के टीचरों का नॉन-ट्राइबल क्षेत्र में तबादला फिर भी नहीं होने वाला है। हालांकि राजस्थान शिक्षक कर्मचारी संघ (समायोजन) के प्रदेश अध्यक्ष बीएल मिश्रा विश्वास जताते हैं कि तबादले तो सभी क्षेत्र के टिचरों के सौ फीसदी होंगे। बस, मसला थोड़ा और पक जाए। मुख्यमंत्री यही हालात के बनने का इंतजार कर रहे हैं। हरी झंडी उन्हीं को दिखानी है। मंत्री, नौकरशाही इसमें चाह कर भी कुछ नहीं कर सकती है। लिहाजा वे सब भी मसले के तूल पकड़ने की हसरत लिए बैठे हैं। ताकि मुख्यमंत्री का इशारा मिले और वे टीचर तबादले के झंझट को निपटा सकें।

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