लॉरेंस गैंग ने सीधे मंत्री से मांगी फिरौती

Gangster Lawrence Bishnoi. File photo

राजस्थान में राज्यसभा चुनाव के लिए उदयपुर की बाड़ेबंदी में मौजूद कैबिनेट मंत्री गोविंदराम मेघवाल से 70 लाख रुपए की फिरौती मांगी गई है। धमकी देने वाले ने खुद को लॉरेंस गैंग के संगठन स्टूडेंट ऑर्गेनाइजेशन ऑफ पंजाब यूनिवर्सिटी (एसओपीयू) का मेंबर बताया। रुपए नहीं देने पर उनके प्रधान बेटे सहित पूरे परिवार को जान से मारने की धमकी दी गई है। ये कॉल मलेशिया के आईएसडी कोड से आया है। इसकी पड़ताल में पुलिस की साइबर टीम जुटी हुई है।

धमकी के साथ वॉट्सऐप पर भी मेघवाल को उनके बेटी और बेटे के फोटो भेजे गए हैं। इसमें उनके साथ सुरक्षा नहीं होने का दावा करते हुए धमकी दी है। साथ ही फिरौती की मांग की गई।

बीकानेर एसपीयोगेश यादव ने बताया कि मंगलवार शाम कैबिनेट मंत्री के पास यह कॉल आया था। इसमें 70 लाख रुपए नहीं देने पर परिवार को मारने की धमकी दी गई। इसके बाद से पुलिस की साइबर टीम सक्रिय है। आईजीओम प्रकाश खुद इस मामले की पड़ताल कर रहे हैं। बीकानेर के अलावा श्रीगंगानगर पुलिस को भी सक्रिय किया गया है।

धमकी देने वाले ने स्वयं को एसओपीयूगैंग का सदस्य बताया है, जो गैंगस्टर लॉरेंस का है। उसने मंत्री से वॉट्सऐप पर चैट की है, जिसमें परिवार के सदस्यों के फोटो भेजते हुए बताया गया है कि सुरक्षाकर्मी उनके साथ रहते हैं परिवार के साथ नहीं। इसी चैट को जांच का आधार बनाकर पुलिस की साइबर टीम काम कर रही है।कैबिनेट मंत्री गोविन्दराम मेघवाल का पूरा परिवार राजनीति में है। उनके पुत्र पूगल पंचायत समिति में प्रधान हैं, जबकि बेटी सरिता मेघवाल और पत्नी आशा देवी भी जिला परिषद् सदस्य है।

घूसखोर सरकारी बाबुओं की ढाल बनी सरकार

राजस्थान सरकार भले ही भ्रष्टाचार के खिलाफ जीरो टॉलरेंस के दावे करे, लेकिन हकीकत बिलकुल अलग है। सरकार खुद भ्रष्टाचारियों की ढाल बनी हुई है। 2021 में एसीबी के पास भ्रष्टाचार और पद के दुरुपयोग से जुड़े 280 मामले आए, लेकिन जांच सिर्फ 15 में हो पाई। 265 मामलों में सरकार के एक नियम ने एसीबी के हाथ बांधे दिए।

भ्रष्टाचार निवारण संशोधन अधिनियम 2018 की धारा 17-ए। कहती है कि एसीबी को आरोपी अधिकारी के खिलाफ जांच शुरू करने से पहले उसके विभाग के सक्षम अधिकारी से इजाजत लेनी होगी। इसके चलते 90 प्रतिशत से ज्यादा मामलों में इजाजत मिलती ही नहीं। हाल ही में राज्य सरकार ने केंद्र की एसओपी के आधार पर इस नियम को लेकर आदेश जारी किए हैं।

इस नियम के आने से पिछले साल एसीबी ने सक्षम अधिकारियों से 280 मामलों में जांच की इजाजत मांगी थी, लेकिन सिर्फ 15 मामलों में स्वीकृति मिली और 11 मामलों में मना कर दिया गया। 254 मामलों में न अधिकारियों ने स्वीकृति दी और न ही इनकार किया। इसी तरह इस साल अब तक 88 मामलों में से एसीबी को 9 में ही जांच की स्वीकृति दी गई और 14 मामलों में मना कर दिया गया। 65 मामलों में अधिकारियों ने कोई जवाब नहीं दिया। एसीबी के पास कुल 319 मामले पेंडिंग हैं, जिनमें अब तक अधिकारियों ने कोई जवाब नहीं दिया।

सक्षम अधिकारियों के जवाब न देने का ही नतीजा है कि आरोप लगने के तीन साल बाद भी  टॉपर टीना डाबी, इन्द्र सिंह राव जैसे कई आईएएस और आरएएस अधिकारियों के खिलाफ एसीबीजांच शुरू नहीं कर पाई है।एसीबी के अधिकारियों का कहना है कि पद के दुरुपयोग की बहुत शिकायत आती हैं, लेकिन जिनमें एसीबी को पुख्ता सबूत मिलते हैं, उनमें ही जांच की इजाजत के लिए सक्षम अधिकारी को पत्र भेजा जाता है। ज्यादातर मामलों में सक्षम अधिकारी जवाब ही नहीं देते।

सूत्रों के अनुसार अधिकारियों के दबाव के कारण राज्य सरकार ने केंद्र की एसओपी के आधार पर आदेश जारी किए हैं। पिछले दिनों एसीबी ने महिला एवं बाल विकास विभाग में मैन पावर उपलब्ध करवाने को लेकर रिश्वत मांगने के एक मामले में आरएएस भागचंद को बुलाकर चार घंटे पूछताछ की थी। इसके बाद विरोध तेज हो गया था। पिछले दिनों आरएएस अधिकारियों ने भी मुख्य सचिव ऊषा शर्मा के चैंबर में पहुंचकर एसीबी की कार्रवाई का विरोध किया था।

सरकार ने अपने ताजे आदेश में दलील दी है कि अधिकारी फैसला लेने में देरी नहीं करें और देश के विकास में तेजी बनी रहे। ईमानदार और मेहनत से काम करने वाले अधिकारियों-कर्मचारियों को भयमुक्त वातावरण का माहौल देना उसकी प्राथमिकता है।

एसीबी नियमों के तहत जांच के लिए सक्षम अधिकारी से स्वीकृति मांगती है। नियमों में तीन-चार महीनों में जांच की स्वीकृति देने या मनाही करने की बात है। कोई जवाब नहीं आने पर रिमाइंडर भेजे जाते हैं। तय समयावधि पर जवाब नहीं मिलने पर एसीबी अपने स्तर पर सीधी कार्रवाई शुरू कर दे, ऐसा कोई नियम नहीं है।

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