बगैर चुनाव जीते सरकार बनाने में माहिर भाजपा

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भाजपा ने बगैर चुनाव जीते सरकार बनाने में महारथ हासिल कर ली है। इसके लिए पार्टी ने ‘ऑपरेशन लोटस’ चलाया हुआ है। इसके तहत पार्टी सीटें पूरी न होने के बावजूद राज्य सरकार बनाने की कोशिश करती है। पिछले 6 सालों में भाजपा ने सात राज्यों में ऑपरेशन लोटस चलाया। चार राज्यों में पार्टी को सफलता मिली है, जबकि तीन में मात खानी पड़ी।

भाजपा के इस खेल का ताजा उदाहरण महाराष्ट्र में देखने को मिल रहा है। जहां शिवसेना के कद्दावर नेता एकनाथ शिंदे ने पूरी योजना के साथ बगावत की है। शिंदे की अगुवाई में मंगलवार को सूरत में ठहरे शिवसेना के बागी विधायक बुधवार की सुबह गुवाहाटी पहुंच चुके हैं। वहां से इनको इंफाल ले जाने की तैयारी चल रही है। 25 बागी विधायकों से शुरू हुआ सिलसिला 42 विधायकों तक पहुंच चुका है।

इससे पहले भी जब 24 अक्टूबर 2019 को महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के नतीजे को घोषित हुए तो भाजपा-शिवसेना गठबंधन को स्पष्ट बहुमत मिला था। भाजपा को 105 और शिवसेना को 56 सीटें मिलीं। वहीं एनसीपी को 54 और कांग्रेस को 44 सीटों पर जीत मिली। मगर सीएम पद को लेकर भाजपा और शिवसेना अलग हो गईं।

शिवसेना ने एनसीपी और कांग्रेस से हाथ मिलकर सरकार बनाने की घोषणा की, लेकिन इसके एक दिन बाद 23 नवंबर 2019 को ही सीएम के रूप में देवेंद्र फडणवीस ने शपथ ले ली। उनके साथ अजित पवार ने भी डिप्टी सीएम पद की शपथ ली।

एमसीपी प्रमुख शरद पवार ने पार्टी के विधायकों को अजित के साथ जाने से रोक लिया। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने फ्लोर टेस्ट का आदेश दिया। जब फडणवीस को लगा कि वह बहुमत नहीं हासिल कर पाएंगे तो उन्होंने 72 घंटे में ही सीएम पद से इस्तीफा दे दिया। उस बार तो भाजपा की एनसीपी तोड़कर सरकार बनाने की रणनीति फेल हो गई, लेकिन ताजे घटनाक्रम में बाजी शिवसेंना के हाथ से निकलती दिखाई दे रही है।

मद्य प्रदेश में कांग्रेस के असंतुष्ट नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया और उनके समर्थक विधायकों को भाजपा के पाले में करना और कमलनाथ की सरकार गिरा देने की कमान भाजपा नेता नरोत्तम मिश्रा के हाथ में सौंपी गई। तमाम कोशिशों के बाद भी सिंधिया नहीं माने और कमलनाथ सरकार अल्पमत में आ गई। 20 मार्च 2020 को महज 15 महीने मुख्यमंत्री रहने के बाद कमलनाथ ने इस्तीफा दे दिया और कांग्रेस सरकार गिर गई। शिवराज सिंह चौहान प्रदेश के नए मुख्यमंत्री बने।

राजस्थान में सीएम नहीं बन पाने के कारण नाराज सचिन पायलट के जरिए कांग्रेस विधायकों को भाजपा के पाले में कर अशोक गहलोत की सरकार को गिराने की जिम्मवारी राजस्थान भाजपा को सौंपी गई। गहलोत भी अपनी कुर्सी बचाने के लिए सक्रिय हो गए। सबसे पहले उन्होंने अपने पाले वाले विधायकों को एक होटल में रखा। इसके बाद प्रियंका गांधी वाड्रा ने सचिन पायलट से 10 अगस्त 2020 को बातचीत कर उन्हें मना लिया। यहां पर गहलोत भारी पड़े। भाजपा की कांग्रेस विधायकों को तोड़ने की रणनीति विफल हो गई।

कर्नाटक में भाजपा ने कांग्रेस और जेडीएस के विधायकों को अपने पाले में करके विधानसभा में बहुमत का आंकड़ा कम करने का जिम्मा बीएस येदियुरप्पा को सौंपा। 2017 के कर्नाटक विधानसभा चुनाव में भाजपा 104 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी। बीएस येदियुरप्पा नेसीएम पद की शपथ भी ले ली, लेकिन फ्लोर टेस्ट पास नहीं कर पाए। सरकार गिर गई। इसके बाद कांग्रेस के 80 और जेडीएस के 37 विधायकों ने मिलकर सरकार बना ली। 2 साल भी पूरे नहीं हुए थे कि वहां राजनीतिक संकट शुरू हो गया। जुलाई 2019 में कांग्रेस के 12 और जेडीएस के 3 विधायक बागी हो गए। कांग्रेस-जेडीएस सरकार के पास 101 सीटें बचीं। वहीं बाजपा की 105 सीटें बरकरार रहीं। मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा और वहां से फ्लोर टेस्ट का आदेश दिया गया। सरकार फ्लोर टेस्ट में फेल हो गई और सीएम कुमारस्वामी ने इस्तीफा दे दिया।

गोवा में कम सीटें होने के बावजूद सरकार बनाने का दावा पहले पेश करना भाजपा का रणनीति थी। मनोहर पर्रिकर ने 21 विधायकों के समर्थन की बात कहते हुए सरकार बनाने का दावा पेश किया। राज्यपाल मृदुला सिन्हा ने उन्हें सरकार गठन का न्यौता दे दिया। राहुल गांधी ने आरोप लगाया कि गोवा में कांग्रेस के बहुमत का भाजपा ने हरण कर लिया। कांग्रेस का तर्क था कि सबसे बड़ी पार्टी होने के नाते सरकार गठन के लिए उन्हें पहले बुलाया जाना चाहिए था।

अरुणाचल में भाजपा की रणनीति कांग्रेस के दो तिहाई से ज्यादा विधायकों को तोड़कर नई सरकार बनाने की थी। 2014 चुनाव के बाद अरुणाचल प्रदेश में कांग्रेस ने पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई। हालांकि कांग्रेस के नेताओं के बीच की रंजिश खुलकर सामने आती रही। आखिरकार 16 सितंबर 2016 को कांग्रेस पार्टी के मुख्यमंत्री पेमा खांडू और 42 विधायक पार्टी छोड़कर पीपुल्स पार्टी ऑफ अरुणाचल प्रदेश में शामिल हो गए। पीपीए ने भाजपा के साथ मिलकर सरकार बनाई।

उत्तराखंड में 2012 के विधानसभा चुनाव में त्रिशंकु विधानसभा रही। कांग्रेस 32 सीटें जीतकर सबसे बड़ी पार्टी बनी, जबकि भाजपा को 31 सीटें मिलीं। भाजपा इस हार को पचा नहीं पा रही थी। जैसे ही कांग्रेस ने केदारनाथ आपदा के बाद विजय बहुगुणा को हटाकर 2014 में हरीश रावत को सीएम बनाया, भाजपा को यहां उम्मीदें दिखने लगीं। भाजपा ने बहुगुणा की नाराजगी का फायदा उठाया। 18 मार्च 2016 को बहुगुणा समेत कांग्रेस के 9 विधायक बागी हो गए। हालांकि, उत्तराखंड के स्पीकर ने जब कांग्रेस के 9 बागियों को अयोग्य घोषित कर दिया तो केंद्र सरकार ने उसी दिन राज्य में राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर बागी विधायकों को दूर रखते हुए शक्ति परीक्षण कराया गया। 11 मई 2016 को बहुमत परीक्षण में रावत की जीत हुई। सुप्रीम कोर्ट के चलते यहां भी विधायकों को तोड़ने का भाजपा का पैंतरा काम नहीं आया।

इन सात राज्यों के घटनाक्रम से पता चलता है कि ‘ऑपरेशन लोटस’ के तहत भाजपा दो तरह की रणनीति अपनाती है। पहला- विपक्षी पार्टी के नाराज गुट को अपने पाले में करके सरकार बनाना। दूसरा- छोटे दलों और निर्दलियों को अपने पाले में करके सरकार बनाना। महाराष्ट्र में पहली रणनीति अपनाई जा रही है। 40 से ज्यादा विधायकों की बगावत का सीधा मतलब है महाराष्ट्र की उद्धव सरकार गहरे संकट में है।

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