गहनों से लदी महिलाएं पहुंचीं मेले में

जोधपुर के खेजड़ली गांव में सोमवार को पर्यावरण को समर्पित अनूठे मेले में बिश्नोई समाज के लोग बड़ी संख्या में पहुंचे। इस शहीदी मेले में हजारों पर्यावरण प्रेमियों ने पेड़ों के लिए कुर्बान होने वाले 363 शहीदों को श्रद्धांजलि दी।

सिर सांठे रूंख रहे तो भी सस्तो जांण…यानी अगर सिर कटने से वृक्ष बच रहा हो तो ये सस्ता सौदा है….की सोच के साथ 18 वीं सदी में खेजड़ली के मेले वाले स्थान पर पेड़ों की रक्षा के लिए अमृता देवी सहित 363 लोग शहीद हो गए थे। उनकी याद में श्रद्धांजलि देने के लिए बिश्नोई समाज का यह मेला खेजड़ली गांव में हर साल भरता है। इस बार दो साल बाद आयोजित इस मेले में बिश्नोई समाज के काफी संख्या में लोग पहुंचे।

मेले में बिश्नोई समाज की महिलाएं भी बड़ी संख्या में सोने के गहनों से सज-धज कर पहुंचती हैं। दो साल बाद भरे मेले में महिलाएं आभूषणों से लक-दक नजर आईं। मेले में ज्यादातर महिलाएं जोधपुर संभाग से आती हैं। 20 से 25 हजार महिलाएं हिस्सा लेती हैं। सभी भारी-भरकम गहनों से सजी-धजी पहुंचती है। सैकड़ों किलो से ज्यादा सोने के जेवर पहन महिलाएं इस मेले में बिंदास और बेफिक्री से शामिल हो रही हैं। बिश्नोई समाज में सोने के आभूषण सामाजिक प्रतिष्ठा का प्रतीक हैं। अधिकांश महिलाएं 50 तोले तक के गहने पहन कर आईं। 25 तोले से ऊपर के वजन की आड़ महिलाओं ने पहन रखी थी। हाथों में बाजू बंध, रखड़ी, हथफूल, चूड़ी कंगन, जोधा अकबर सेट आदि ज्वेलरी पहन कर महिलाओं ने मेले में शिरकत की।

खेजड़ली मेला भादो की दशमी को भरता है। इस दिन यानी 21 सितम्बर 1730 को बिश्नोई स्त्री पुरुषों ने खेजड़ी के वृक्षों की रक्षा के लिए बलिदान दिया था। पेड़ों के लिए ऐसी शहादत कहीं देखने को नहीं मिलती।

बताते हैं कि 21 सितम्बर 1730 मंगलवार के दिन मारवाड़ जोधपुर के महाराजा अभय सिंह ने अपने निर्माणाधीन महला के लिए 24 किलोमीटर दूर खेजड़ली से पेड काटकर लाने का हुक्म दिया था। सैनिक खेजड़ली गांव में पहुंचकर रामू खोड़ के घर के बाहर लगा खेजड़ी का पेड़ काटने लगे तो रामू की पत्नी अमृता देवी ने विरोध किया। वह पेड़ से चिपक गई। सैनिकों ने उसे कुल्हाड़ी से काट दिया। इसके बाद अमृता देवी की तीनों बेटियों आसू, रत्नी और भागू बाई भी एक-एक पेड़ को बचाने के लिए तने से लिपट गई और सैनिकों ने उन्हें भी काट दिया। यह बात पूरे गांव में फैली तो लोग खेजड़ी के पेड़ों से लिपट गए। राजा के सैनिकों ने 71 महिलाओं व 292 पुरुषों यानी कुल 363 लोगों को काट डाला। महाराजा अभय सिंह तक यह बात पहुंची तो उन्होंने पेड़ों की कटाई पर रोक लगा दी और विश्नोई समाज को लिखित में वचन दिया कि मारवाड़ में कभी खेजड़ी का पेड़ नहीं काटा जाएगा।

इस दिन की याद में खेजड़ली में हर साल शहीदी मेला लगता है। वैसे वन्यजीवों को बचाने में भी विश्नोई समाज हमेशा अग्रणी रहा है। हिरणों को बचाने के प्रयास में समाज के कई लोग शिकारियों की गोली का शिकार हो चुके हैं।

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