जयपुर से हमेशा जुड़ी रही समृद्धि

विश्व विरासत जयपुर शहर आज अपना 295वां स्थापना दिवस मना रहा है। इस शहर की स्थापना 1727 में महाराजा सवाई जयसिंह द्वितीय ने की थी। स्थापना के वक्त 9 मील में बसा जयपुर शहर अब परकोटे से बाहर कई किलोमीटर दूर निकल गया है। शुरूआत में जयपुर को 1 से 2 लाख की आबादी के लिए बसाया गया था। अब मेट्रो सिटी के रूप में बढ़ते-बढ़ते जयपुर की आबादी 70 लाख के पार जा चुकी है। जयपुर में तीन जगहों को यूनेस्को वर्ल्ड हेरिटेज साइट का दर्जा हासिल है। इनमें जयपुर की पुराना शहर, आमेर किला और जंतर मंतर शामिल हैं।

18 नवम्बर 1727 को इस शहर की नींव आमेर के कछवाहा शासक सवाई जयसिंह-द्वितीय (1700-1743 ई.) ने रखी थी। दुनियाभर में जयपुर को पिंकसिटी, गुलाबी नगरी, भारत का पेरिस जैसे नामों से पहचाना जाता है। लेकिन यह शहर खुदमें गौरवशाली इतिहास और भविष्य की सम्भावनाओं को समेटे हुए है।

नौ चौकड़ियों में बसाए गए इस शहर की उत्तर दिशा में सुमेरू पर्वत का प्रतीक मानते हुए चौकड़ी सरहद का नाम दिया गया। इसमें जयपुर के राजपरिवार ने अपना निवास सिटी पैलेस बनाया और शासकीय भवनों को शामिल किया। इसके अलावा एक चौकड़ी में जंतर मंतर तथा हवामहल की स्थापना की गई। बाकी सात चौकड़ियों में प्रजा और व्यापारियों को जगह दी गई। जोरावर सिंह गेट के पास चौकड़ी गंगापोल, सूरजपोल से जुड़ा भाग चौकड़ी तोपखाना हजूरी, चौकड़ी रामचंद्र जी, चौकड़ी विश्वेश्वर जी, चौकड़ी ब्रह्मपुरी को बसाया गया।

परकोटे में 3 चौपड़ बनाई गईं। सबसे पहले उत्तर दिशा में रामगंज चौपड़ बनवाई। इसे महाकाली का स्वरूप मानकर सुरक्षा के लिहाज से यहां योद्धाओं को बसाया। यहीं से दिल्ली और आगरा की तरफ से प्रवेश होता था। बड़ी चौपड़ को मां महालक्ष्मी का स्वरूप माना गया। इस चौपड़ को माणक चौक भी कहा गया। यहां जौहरी और बड़े व्यापारियों को बसाया गया, इसीलिए यह जौहरी बाजार कहलाया। इसी प्रकार तीसरी चौपड़ छोटी चौपड़ कहलाई, जिसको मां सरस्वती का स्वरूप माना गया। यहां ब्रह्मपुरी और पुरानी बस्ती में पूजा उपासना करने वाले विद्वान ब्राह्मणों को बसाया।

आमेर के राजा जयसिंह द्वितीय अपनी राजधानी को आमेर से नीचे समतल मैदानी भाग में स्थानांतरित करना चाहते थे। तब उन्होंने जयपुर शहर की नींव रखी। तब उनके नाम पर बने शहर का नाम सवाई जैपुर था। फिर बदलते-बदलते जैपुर हुआ। आखिर में इसका नाम बोलचाल में आसानी के नजरिए से जयपुर हो गया। स्थानीय ढूंढ़ाड़ी भाषा में आज भी लोग इसे जैपर कहते हैं।

जयपुर के परकोटे की तुलना पेरिस और मॉस्को के क्रेमलिन से की जाने लगी थी। सवाई रामसिंह के बाद माधोसिंह ने अपनी सोच से शहर में सीवरेज और गन्दे पानी की निकासी के लिए अंडरग्राउंड लाइनें डलवाईं। इंग्लैंड यात्रा करके आए माधोसिंह की सोच जयपुर शहर को आधुनिक बनाने की थी। 1922 में माधोसिंह के निधन के बाद सवाई मानसिंह के शासनकाल में कई सुधार हुए। तब जयपुर की जनसंख्या महज 1 लाख से भी कम थी। लेकिन अजमेर के मेयो कॉलेज में इंग्लिश एजुकेशन सिस्टम से पढ़कर आए मानसिंह की कल्पना ने परकोटे को पार किया। उस समय दक्षिण भारत में मैसूर सबसे समृद्ध रजवाड़ा माना जाता था। मैसूर राज्य का ही एक हिस्सा बैंगलोर था। मैसूर के महाराजा कृष्ण राजा वाडियार चतुर्थ ने अपने दीवान सर मिर्जा मुहम्मद इस्माइल के साथ मैसूर राज का विकास किया था। महात्मा गांधी भी मैसूर राज्य को अपने सपनों का रामराज्य मानने लगे थे।

मिर्जा इस्माइल 1942 में मैसूर छोड़ कर जयपुर आ गए। मौसूर में 1940 में महाराजा कृष्णराजा के निधन के बाद नए महाराजा धर्मराजा वाडियर से उनकी ज्यादा नहीं पटी। 1941 में उन्होंने मैसूर के दीवान पद से इस्तीफा दे दिया। फिर सवाई मानसिंह के आग्रह पर जून 1942 में सर मिर्जा इस्माइल जयपुर आ गए और परकोटे के बाहर दक्षिण छोर के विकास का जिम्मा सम्भाला। उन्होंने यह काम इतना बेहतरीन ढंग से करवाया कि एक साल के लिए दीवान का पद स्वीकार करने वाले सर मिर्जा का कार्यकाल दो साल बढ़ा दिया गया।

जुलाई 1946 में जयपुर से इस्तीफा देने के बाद मिर्जा इस्माइल अगस्त में हैदराबाद के निज़ाम के प्रधानमंत्री बन गए। उनकी सेवाओं के सम्मान के रूप में महाराजा ने उनके नाम पर जयपुर की सबसे महत्वपूर्ण सड़कों में से एक का नाम एमआई रोड रख दिया।

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  Change )

Connecting to %s

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.