छोटे परिवार – उपेक्षित परिवार

— अनिल चतुर्वेदी —
सभी पाठकों को-नए साल की हार्दिक शुभकामना
इस जनवरी अंक में हम जो मुद्दा प्रमुखता से उठा रहे हैं, उसे लेकर हमारे ऊपर मनुवादी, कुलीन जाति की सोच और न जाने क्या-क्या तोहमत लग सकती हैं। सम्पादकीय की शुरुआत मैं जिस उदाहरण के साथ करने वाला हूं, उसे पढकर तो मुझे सीधे-सीधे अगड़ी मानसिकता वाला बताया जा सकता है।
इन शंकाओं के बावजूद हम ये मुद्दा ले रहे हैं और इस कॉलम में वो उदाहरण भी दे रहे हैं। क्योंकि चर्चित विषय एक ऐसे वर्ग से जुड़ा है, जिसने देशहित में अपने परिवार को सीमित कर लिया। जनसंख्या विस्फोट को अपने देश की गंभीर समस्या मानते हुए, इस वर्ग ने भरे-पूरे परिवार की चाहत को तिलांजलि दे दी। पर अफसोस कि वही वर्ग प्रोत्साहन पाने की बजाय आज के राजनेताओं की निगाह में बेमानी बन गया है। नेताओं की वोटबैंक राजनीति में इस वर्ग का वजूद ही नहीं का बराबर हो चला है।
अब उदाहरण पर गौर करें…देश में नागरिकता कानून के खिलाफ भडक़े उग्र विरोध में कई राज्य सुलगे हुए हैं। शासन तंत्र ने अफवाह पर काबू पाने के लिए नेटबंदी कर दी। तमाम स्थानों पर हिंसक वारदतें हुईं। किंतु उत्तर प्रदेश के तीन शहरों में कुछ नहीं हुआ, पूरी तरह शांति रही। इन शहरों की कानून-व्यवस्था संभालने वाले पुलिस अमले की कमान, दिल्ली से प्रकाशित एक अंग्रेजी अखबार के अनुसार, मिश्रा, तिवारी और चतुर्वेदी अधिकारियों के हाथों में थी। मतलब इन तीनों जिला पुलिस अधीक्षकों ने खुद के प्रशासनिक कौशल का परिचय देते हुए अपने-अपने शहरों में हिंसक हालात बनने ही नहीं दिए। ये तीनों पुलिस अधिकारी उसी सीमित परिवार वर्ग का प्रतिनिधित्व करते हैं, जो राजनीतिक उपेक्षा का दंश झेल रहा है।
कहने का तात्पर्य ये कि क्या ऐसे देशवासियों ने अपने परिवार सीमित कर, बच्चों को बेहतर परवरिश व शिक्षा देकर कोई अपराध किया है ? या फिर, इन शिक्षित बच्चों ने अच्छा इंसान बनकर अपनी पारिवारिक तथा सामाजिक जिम्मेदारियों का कुशलता से निभाने का गुनाह कर दिया है? जो इन्हें अपने ही देश की राजनीति में उचित मान-सम्मान नहीं मिल रहा। वहीं, जिन वर्गों, समुदायों ने परिवार नियोजन की धज्जियां उड़ाते हुए बेहिसाब बच्चे पैदा किए, वे आज वोटबैंक के नाम पर पूजे जा रहे हैं। राजनीति में इनकी ही सक्रियता सर्वाधिक है। सरकारी नीतियां, योजनाएं इन्हीं की सुविधानुसार बनाई जा रही हैं। जब सारे लाभों का परनाला इन्हीं वर्गों, समुदायों की ओर मोड़ दिया गया है तो फिर हमारा राजतंत्र जनसंख्या विस्फोट पर चिंता क्यों जता रहा है ?
हम ये नहीं कहते कि राजनेताओं ने जनसंख्या विस्फोट पर काबू पाने के लिए कुछ नहीं किया हैं। उन्होंने आबादी नियंत्रित के प्रति जागरूकता पैदा करने के उपाय जरूर किए हैं, किंतु ये उपाय वोटबैक की बाधा को पार क्यों नहीं कर पा रहे हैं? साफ है कि नेताओं में देशहित से ज्यादा खुद की सियासत महफूस रखने की चिंता है। इसीलिए न तो उनमें वोटबैंक को नाराज करने, न ही सीमित परिवार का भला करने की इच्छाशक्ति नजर आती है। कमजोर इच्छाशक्ति से देश को प्रगति की राह पर आगे ले जाने की बात करना, देशवासियों को मूर्ख बनाने के सिवा कुछ नहीं है। इस गंभीर मसले को लेकर अंदर के पेजों पर काफी चिंतन-मनन किया गया है। आप भी देखें, पढें और उचित समझें तो बताएं कि–क्या मैं झूठ बोल्यां।

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