दो नहीं एक भारत

— अनिल चतुर्वेदी —
कांग्रेस नेता एवं जाने-माने वकील कपिल सिब्बल ने हाल ही में कहा कि देश में दो भारत बन चुके हैं। एक वो जो कोरोना लॉकडाउन के दौरान घर में अंत्याक्षरी खेलता है, पालतू जानवरों के साथ वक्त बिताता है, रामायण देखता, थाली-घंटी बजाता और अंधेरे में मोमबत्ती जलाता है। दूसरा भारत, बेरोजगार होकर सड़कों पर उतरता है, जेब में थोड़े से पैसे, बिस्कुट, चने लेकर बैग लटकाए परिवार समेत पैदल ही मीलों दूर घर के लिए निकलता है। ये भारत, कोरोना वायरस से कहीं बड़ा संकट पेट की भूख को मानता है।
सिब्बल का यह बयान राजनीतिक जुमलेबाजी मान कर खारिज किया जा सकता है। मगर देश की जो तस्वीर उन्होंने दिखाई है, उसे क्या नजरंदाज किया सकता है? वास्तविकता तो ये है कि नवंबर 2016 से जो हालात बने हैं, उसने सिर्फ सड़कों पर उतरे दूसरे भारत की कमर तोड़ी है। यही वर्ग बेरोजगारी और मंदी की मार से पैसे-पैसे को मोहताज हुआ है। नोटबंदी की कतार में लगने के बाद यही भारत दिहाड़ी मजदूरी के लिए तभी से दर-दर भकट रहा है। अभी कोरोना वायरस की आफत में खुद का बचाव किए बिना हुजूम के रूप में पदयात्रा भी यही कर रहा है।
सम्पन्न भारत तो 2014 से ही तृप्त हो रहा है। नोटबंदी के बावजूद ये अमीरों की संख्या बढा रहा है। इस समय कोरोना लॉकडाउन में घर में रहने की गंभीरता भी सम्पन्न भारत ही दिखा रहा है। और तो और, प्रधानसेवक की अपीलों की पालना में अतिउत्साह भी यही वर्ग प्रदर्शित कर रहा है।
यह नजारा सवाल पैदा करता है कि, क्या प्रधानसेवक केवल सम्पन्न भारत के शासक हैं? ये हकीकत उनके अब तक से शासनकाल में बार-बार क्यों उजागर हो रही है? जहां एक भारत सम्पन्नता की सीढी पर ऊंची छलांग मार रहा है, वहीं दूसरा भारत विपन्नता की खाई में गहरे समाता जा रहा है।
हमारा यह अंक कोरोना की आफत पर ही केन्द्रित है। इसमें कोई शक नहीं कि कोरोना, महामारी फैलाने वाला बहुत खतरनाक वायरस है। इससे बचने के लिए देश में सरकारी स्तर पर हो रहे उपाय आपात श्रेणी के हैं। इस वायरस की आफत इतनी बुरी है कि पूरी आबादी के सहयोग बिना इस पर पार पाना संभव नहीं है।
लेकिन विडंबना यह है कि देश में 40 फीसदी तक लोग गरीब, अतिगरीब, निरक्षर अथवा अल्प-साक्षर हैं। 70 फीसदी लोग कम विकसित इलाकों या गांवों में रहते हैं। पर सभी ग्रामीण खेती-बाड़ी से जुड़े हुए नहीं हैं। बड़ी संख्या में लोग रोजी-रोटी के लिए शहरों में आते हैं। उन्हीं की बदौलत तमाम उद्योग, निर्माण-कार्य तथा दुकानें-प्रतिष्ठान चलते हैं। यहां तक कि शहरी परिवहन, दो-पहिया, वाहन मैकनिक, पान सिगरेट, चाय-पोहा आदि सड़क किनारे लगने वाले ठेले-थड़ियां, ज्यादातर बाहरी लोगों की होती हैं।
इन छोटे काम-धंधें वालों तथा दिहाड़ी मजदूरों की रोजी-रोटी छिन जाएगी तो ये घर की ओर ही भागेंगे। कहते हैं न, अति खुशी और अति गम में इंसान को अपना घर, अपने लोग ही याद आते है। कामगारों की सर्वोच्च प्राथमिकता दो वक्त की रोटी का जुगाड़ करना है। उनके लिए कोरोना से बचाव इतना जरूरी नहीं। इस बड़े वर्ग के मनोविज्ञान को न समझना शासक-प्रशासक की कमजोरी ही मानी जाएगी। समस्या तब और गंभीर हो जाती है, जब राजपुरुष केवल अमीर, नियो-रिच और मध्यम वर्ग को ही प्रजा मानने लग जाते हैं। छोटे काम-धंधे वाले और मजदूर इनके राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक तीनों ही एजेंडे में फिट नहीं बैठते। ‘’तभी तो शासन व धनपतियों द्वारा इन्हें सिर्फ संबल प्रदान किया जाता है, पेट भरने की खुशी नहीं दी जाती है’’–ये बात कुछ दिन पहले राजस्थान के बुजुर्ग नेता प. रामकिशन ने कही थी।
ऐसे हाल में मुमकिन है, भेड़-बकरी समान मान ली गई निम्न तबके की आबादी, कोरोना जैसी आपदा में कुछ करोड़ कम हो जाए। इनकी संख्या घटने से अमीर, नियो-रिच औऱ मध्यम वर्ग को शायद फर्क न पड़े। वे तब कच्ची बस्तियों और भीड़-भाड़ की कांय-कांय नहीं सुनाई देने से खुश भी हों। पर ऐसी राक्षसी मंशा रखने वाले अपनी ही दुनिया में खोए लोगों को वास्तविकता का आइना दिखाना चाहूंगा कि कामगारों के बिना उद्योग-धंधे, खेत-खलिहान तथा शहर गतिशील नहीं रह जाएंगे।
लिहाजा, समूची आबादी को एक नजरिये से देखने में ही देश की भलाई है। शासन से जुड़े माननीय यदि बार-बार सिर्फ आबादी की संख्या बताने की बजाय 130 करोड़ लोगों के एक-समान विकास पर ध्यान दें तो दूसरे भारत के लिए महामारी के इस दौर में भी सड़क पर उतरने की नौबत नहीं आएगी। एक-समान विकास से मतलब है, अमीरों की संख्या में बढ़ोत्तरी की खबरें बंद होकर देशभर में खुशहाली की रिपोर्टें आना शुरू हो जाएं।
हमारा मार्च अंक लॉकडाउन की वजह से समय पर प्रकाशित नहीं हो पाया। अंक तैयार था, लेकिन सब कुछ बंद हो गया, प्रिंटिंग प्रेस भी। फिर भी पत्रिका प्रकाशन की नियमितता बनाए रखते हुए यह अंक कुछ विलंब से निकाला जा रहा है। आगे हालात सामान्य होने पर पत्रिका की छपाई समय पर होती रहेगी। अपेक्षा है कि पाठकगण हमारी दिक्कत महसूस कर अपना बहुमूल्य सहयोग बनाए रखेंगे।

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