दुर्गा मानें, भोग्या नहीं

— आभा शर्मा —

हाल ही में नवरात्र के समापन पर एक व्हाट्सएप सन्देश देखने में आया। संक्षिप्त संदेश, बहुत कुछ कह गया। दुर्गा माँ के मुखौटे के पीछे से झांकता एक नारी मुख था और इबारत थी- ‘मेरे मिट्टी के अवतार में इन दिनों मुझे खूब प्रेम, आदर-मान, दुलार मिला…उम्मीद है मेरे हाड़-माँस के अवतरण में भी इसका कुछ अंश तो अवश्य मिलता रहेगा…’

नवरात्र में माँ दुर्गा का आह्वान, शक्ति की उपासना, बालिकाओं का पद प्रक्षालन…ये भारतीय संस्कृति की पावन परंपरा है। भारत ही वो देश है जहाँ ‘यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते, रमन्ते तत्र देवता’ जैसे श्लोक रचे गए हैं।  ‘जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी’ का उदघोष करते हुए माता और मातृभूमि को स्वर्ग से भी ऊँचा दर्जा दिया गया है। पर जब हम लोक-व्यवहार पर नजर डालते हैं तो महिलाओं पर हिंसा की बढती घटनाएं नजर आती हैं। भारतीय समाज में महिलाओं के प्रति व्यवहार के मामले में व्याप्त विसंगतियां और विरोधाभास बहुत चिंताजनक हैं। महिलाओं पर हिंसा, अभद्र व्यवहार, दमन और शोषण की घटनाएं गंभीर हैं। महिलाओं को प्रताडि़त करने के लिए अब सोशल मीडिया का दुरुपयोग भी बेखौफ होने लगा है। महिलाओं की बढ़ती शिक्षा और कई क्षेत्रों में सफलता के बावजूद समाज के रवैये में बदलाव बहुत धीमा है। अभी भी उनको दोयम दर्जे का माना जाता है।

महिलाओं पर अपराध बढे

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो द्वारा हाल ही में जारी वर्ष 2019 के आंकड़ों के अनुसार महिलाओं के प्रति अपराध पिछले साल के मुकाबले 7.3 फीसदी बढ़े हैं। इनमें अधिकतर पति अथवा अन्य रिश्तेदारों द्वारा क्रूरता (30.9 फीसदी), शीलहरण की भावना से किये गए हमले (21.8 फीसदी),  अपहरण (17.9 फीसदी) और दुष्कर्म (7.9 फीसदी) के मामले बताये गए हैं। प्रति एक लाख महिला जनसंख्या पर दर्ज अपराध दर जो वर्ष 2018 में 58.8 थी, वर्ष 2019 में बढक़र 62.4 हो गई। इतना ही नहीं, वर्ष 2019 के दौरान दर्ज साइबर अपराधों में भी वृद्धि देखी गई, जिसमें 5.1 प्रतिशत (2,266 मामले) यौन शोषण और 4.2 प्रतिशत मामले (1,874) अपमानित करने के थे। यदि 2019 के गुमशुदा बच्चों के आंकड़ों को देखें तो उनमें भी कुल 73,138 बच्चों में से 52,049 लड़कियां हैं।

वीभत्स और शर्मनाक

अपराधों के आंकड़े बढऩा तो चिंताजनक है ही, महिलाओं के प्रति यौन हिंसा में बढ़ती हैवानियत भयानक है। निर्भया और हालिया हाथरस कांड जैसी वीभत्स घटनाओं पर देश में गंभीर चिंतन होना चाहिए कि आखिर इतनी पैशाचिक प्रवृत्ति और कुंठित मानसिकता क्यों जन्म ले रही है, बढ़ रही हैं? सामूहिक दुष्कर्म की अन्य बहुत सी घटनाएं समूचे देश के लिए शर्मनाक हैं, जिनमें नाबालिग बच्चियों, यहाँ तक की कुछ माह की शिशु बालिकाओं के साथ दुष्कर्म की घटनाएं शामिल हैं। यह भी किसी से छुपा हुआ नहीं है कि महिलाओं के प्रति अपराध के सभी मामले दर्ज भी नहीं होते। यौन हिंसा के अधिकतर मामले इसलिए दर्ज नहीं करवाए जाते, क्योंकि दुष्कर्म की घटना को पीडि़ता के परिवार की प्रतिष्ठा पर आघात माना जाता है, दुष्कर्मी की ‘प्रतिष्ठा’ पर नहीं। इस वजह से कितनी ही घटनाएं पुलिस रिकॉर्ड में कभी दर्ज नहीं होतीं और ऐसे अपराधियों को महिलाओं को प्रताडि़त करने का और मौका मिल जाता है। निर्भया कांड के बाद दुष्कर्म के मामलों में न्याय दिलाने के लिए कानून में संशोधन किया गया, लेकिन अच्छे से अच्छे कानून प्रभावी क्रियान्वयन के बिना बेकार हैं। निर्भया कांड के अपराधियों ने किस प्रकार कानूनी प्रक्रिया की खामियों को ढाल बनाकर अपनी फांसी को बार-बार टलवाने की कोशिश की थी, यह किसी से छुपा नहीं है।

महिलाओं के प्रति यौन अपराधों और हिंसा की बढ़ती घटनाएं उद्वेलित करने वाली हैं और यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि सोशल मीडिया का दुरुपयोग भी महिलाओं को प्रताडि़त (‘ट्रोल’) करने के लिए किया जाने लगा है। बहुत सी उच्च पदस्थ और शिक्षित महिलाओं को भी अभद्र और अमर्यादित ‘ट्रोल्स’ से दो-चार होना पड़ा है।

चिंतन-मंथन जरूरी

निर्भया और हाथरस जैसे वीभत्स कांड हमें सोचने के लिए मजबूर कर रहे हैं कि इतनी पैशाचिक प्रवृत्ति, वीभत्स घटनाएं और कुंठित मानसिकता क्यों जन्म ले रही है? ये बहुत ही गंभीर विषय है जिस पर हर देशवासी को व्यक्तिगत तौर पर तथा परिवार और समुदाय के स्तर पर सोचने की जरूरत है। खुद को टटोलने की जरूरत है कि नवरात्र में असीम भक्तिभाव से देवी की पूजा-अर्चना करने वाले देश में व्यवहार रूप में नारी के दमन और यौन शोषण की पैशाचिक घटनाएं क्यों घट रही हैं। क्या ये संस्कारों के ह्रास का परिणाम है या लचर कानून व पुलिस व्यवस्था की खामियां इन घटनाओं को बढ़ावा दे रही हैं? महिलाओं के प्रति बढ़ते अपराधों के लिए मुफ्त इन्टरनेट (पोर्न साइट्स) की भूमिका पर भी बहुत ध्यान दिए जाने की जरूरत है।

ऐसा देखा गया है कि महिलाओं के प्रति हिंसा और दुव्र्यवहार की घटनाओं के पीछे असमान लैंगिक मनोदृष्टि या रवैया और महिलाओं पर अधिकार/नियंत्रित करने की मनोवृत्ति काफी हद तक जिम्मेदार है। देश की बड़ी महिला आबादी को विरोध, दमन, दुव्र्यवहार और यौन हिंसा के अनेक पहलुओं से गुजरना पड़ता है, चाहे वो कोख में लडक़ी की भ्रूण हत्या के लिए परिवार का दबाव हो, दहेज के लिए यातना हो या कमजोर तबके की महिलाओं पर दबंगों के अत्याचार, जहाँ कई बार दो समुदायों की रंजिश का आक्रोश महिलाओं पर उतारा जाता है। महिलाओं पर प्रभुत्व और नियंत्रण को मर्दानगी का गुण मानते हुए भी ये हिंसा की जाती है। बहुत से मामलों में महिलाओं को जमीन, संपत्ति और अन्य अधिकारों से भी वंचित किया जाता है।

घरेलू हिंसा का पहलू भी बहुत गंभीर है। इस साल राष्ट्रीय महिला आयोग के पास ऐसी बहुत सी शिकायतें आईं जहाँ कोरोना काल के लॉकडाउन में घरेलू हिंसा के बढ़ते मामलों पता चले। आयोग ने  इस पर चिंता व्यक्त की।

साइबर अपराध और युवा

डिजिटल तकनीक के प्रसार से एक नए प्रकार का स्त्रीद्वेषी वातावरण जन्म ले रहा है जो ‘बोइस लॉकर रूम’ जैसे चैटरूम के समय उजागर हुआ। ये बहुत ही हिला देने वाली खबर थी, जिसमें दिल्ली शहर के नामी स्कूलों के बच्चे इस चैट ग्रुप पर स्त्री देह के बारे में अशोभनीय यौन टिप्पणियाँ और दुष्कर्म तक की कल्पना कर रहे थे। ‘बोइस लॉकर रूम’ जैसी घटनाएं न केवल झकझोरने वाली है, बल्कि इस बात की ओर भी इशारा कर रही है कि परिवार और स्कूल प्रशासन दोनों को ही युवा पीढ़ी के इस तरह के व्यवहार के कारणों की तह में जाने की जरूरत है। डिजिटल टेक्नोलोजी पर निर्भरता और मुफ्त इन्टरनेट की उपलब्धता से उसके दुरुपयोग की संभावनाएं बढ़ गई हैं। आज की युवा पीढ़ी समय से पहले युवा हो रही है और परिपक्व होने के पहले ही उनके भटकाव की आशंकाएं बढ़ती जा रही हैं।

 नैतिक शिक्षा और संस्कार

बिहार के बहुत ही सफल कोचिंग संस्थान- ‘सुपर 30’ के आनंद कुमार से पिछले साल जयपुर में एक कार्यक्रम में एक अभिभावक ने सवाल पूछा था कि क्या मेरा बेटा सफल होगा? उनका उत्तर था, आप मुझे एक दिन अपने घर रखकर देखें… यह उत्तर सबको अटपटा लगा पर आनंद कुमार ने अपने अखबारीय कालम में भी इसका जिक्र किया था। उनका कहना था घर पर विद्यार्थी की दिनचर्या और व्यवहार कितना अनुशासित है, उससे वे उनके भविष्य की धारा का अंदाज लगा लेते हैं। भले ही उनकी बात कई लोगों के गले न उतरी हो पर बहुत से मामलों में यह जरूर सही होता है।

यदि बच्चे अपने घर में देखते हैं कि उनकी माँ के साथ आदरजनक व्यवहार नहीं हो रहा है तो इसका प्रभाव उस पर अच्छा नहीं पडऩे वाला। घर के परिवेश में यदि महिलाओं के साथ सम्मानजनक व्यवहार और भाषा का प्रयोग नहीं हो रहा है तो इसका असर बच्चों पर पड़े बिना नहीं रह सकता। घरों का सकारात्मक या नकारात्मक वातावरण बच्चों के अच्छे/बुरे चरित्र निर्माण में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है।

देश में महिला हिंसा की बढ़ती घटनाओं और बर्बरता के मद्देनजर समाज की मानसिकता के सुधार के बारे में युद्ध स्तर पर चर्चा और प्रयास किये जाने की जरूरत है। लैंगिक समानता पर नैतिक शिक्षा हमारे पाठ्यक्रम का हिस्सा होना ही चाहिए। साथ ही यौन शिक्षा को भी स्कूली पाठ्यक्रम में शामिल किये जाने की जरूरत है, ताकि युवा पीढ़ी इन्टरनेट से अधकचरा ज्ञान हासिल कर विकृत मानसिकता का शिकार न बने। अभिभावकों को भी यह सोचने की जरूरत है कि क्या उनके संस्कारों और परवरिश में कोई कमी है ? क्या वे पुत्रों की परवरिश, यानी अनुशासन पर कम ध्यान दे रहे हैं? जैसे वे अपनी बेटियों से उनके कहीं भी आने-जाने के बारे में पूछते हैं, वैसे ही लडक़ों से क्यों नहीं पूछा जाता। वो कहाँ जा रहा है, क्या कर रहा है, घरवालों के दिए पॉकेट मनी का उपयोग किस काम पर खर्च कर रहा है।

हमारी मानसिकता में सुधार और भाषा का संयम भी बहुत जरूरी है। लैंगिक समानता के संस्कार बचपन से ही डाले जाने चाहिए। ‘मर्द को दर्द नहीं होता’, ‘मर्द है तो डरता क्यों है’, ‘क्या तुमने चूडिय़ां पहन रखी हैं’, ‘क्या औरतों की तरह आंसू बहा रहा है’ जैसे जुमले कितने उचित हैं, इन पर भी चर्चा होनी चाहिए। वैसे ही यह भी विचारणीय है कि क्या लड़कियों को ऊँची आवाज में बोलने, हंसने और खेलने-कूदने पर बार-बार टोका जाना जायज है।

हर नवरात्र में मातृ पूजा सिर्फ एक रस्म अदायगी तक सीमित नहीं होनी चाहिए। क्या कभी इस विरोधाभास पर किसी की नजर जाती है कि साल में दो बार नवरात्र में मातृ वन्दना करने वाले समाज की भाषावली माता बहनों के लिए अभद्रता सूचक संकेतों से क्यूँ भरी है?

‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ और अन्य सरकारी कार्यक्रम तब तक सही मायनों में सार्थक नहीं हो सकते जब तक जनमानस में व्याप्त विसंगतियां खत्म नहीं हो जाती। अवसर मिलने पर महिलाएं हर क्षेत्र में अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन कर सकती हैं। अन्तरिक्ष, विमान सेवा, वित्त, सेना, शिक्षा, चिकित्सा, मीडिया और राजनीति सहित कौन सा ऐसा क्षेत्र है, जहाँ महिलाओं ने अपना परचम न लहराया हो। बस जरूरत है तो उन्हें अपने मानवी रूप में उचित सम्मान, स्थान और अवसर उपलब्ध होने की। स्त्रियों के प्रति मानसिकता में बदलाव और लैंगिक समानता पर जागरूकता बेहद जरूरी है और इसके समावेशी परिणाम सम्पूर्ण समाज के लिए सकारात्मक होंगे, इसमें कोई संदेह नहीं है। उम्मीद की जाती है कि वो सुबह कभी तो आएगी…

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