अवसाद का कोढ़

  • अनिल चतुर्वेदी

कोरोना वायरस के खौफ से घरों में दुबकने को मजबूर लोग मानसिक संतुलन खो रहे हैं, ऐसा तो नहीं कहा जा सकता। मगर वे अवसाद ग्रस्त जरूर होते जा रहे हैं। अमीर-गरीब हर तबका इसकी चपेट में आए चला जा रहा है। अपने वर्तमान और भविष्य को लेकर तो लोग बहुत पहले से ही चिंता में हैं, अब इस विकट काल में जान-पहचान वालों के हाल देखकर और सुनकर उनमें मौत का भय सताने लगा है। न जाने क्या होने वाला है—ये घबराहट हर किसी को परेशान कर रही है।

ताज्जुब ये कि घबराहट से उपजे अवसाद में लोग सावचेत होने की बजाय लापरवाह हो रहे हैं। इसकी वजहें भी दिख रही हैं। एक तो आय को लेकर अनिश्चितता। लॉकडाउन के दौरान औऱ बाद में ऐसे-ऐसे लोग सडक़ पर आ रहे हैं, जिन्होंने कभी नौकरी जाने या आमदनी अटकने का सोचा भी नहीं था। शिक्षा, शादी—समारोह, आतिथ्य आदि क्षेत्र से जुड़े करोड़ों लोग बेरोजगार तो नहीं कहलाएंगे, लेकिन उनके आय स्रोत लॉकडाउन के समय से ही बाधित हैं। पैसों की कडक़ी के कारण इन्हें कोई विकल्प नहीं सूझ रहा है। लिहाजा घबराहट में यहां-वहां हाथ पैर मार रहे हैं।

दूसरा, घर में रहते-रहते लोग घुटन महसूस करने लगे हैं। वे बाहर निकल कर दिलो-दिमाग ताजा करना चाह रहे हैं। इनमें युवाओं और अधेड़ की संख्या ज्यादा हैं। इन्हें लगता है कि बिना बीमारी के आखिर कब तक घर में कैद रहा जाए। और अधिक अंदर रहे तो वैसे ही बीमार पड़ जाएंगे। सो, निकलो बाहर, जो होना होगा हो जाएगा। ये दुस्साहस ही अवसाद की अवस्था को दर्शा रहा है।

बड़े पैमाने पर मानसिक व्याधि के लक्षण दिखाई देने के बावजूद हमारे शासक-प्रशासक शारीरिक पीड़ा हरने के उपाय करने में ही व्यस्त हैं। वे इन दिनों में भी मानसिक अस्वस्थता दूर करने की उतनी ही थोड़ी सी कवायद कर रहे हैं, जितनी सामान्य दिनों में करते आए हैं। अवसाद के बढ़ते मामले देखते हुए अस्पतालों में मनोचिकित्सक उपलब्ध कराने की घोषणा मात्र की गई है। घोषणा पर अमल बहुत कम देखा जा रहा है। सरकारी उदासीनता की पुष्टि विश्व स्वास्थ संगठन के खुलासे से भी होती है। डब्लू.एच.ओ. के अनुसार भारत में मानसिक रोगी के इलाज पर सरकार सालभर में मात्र 20 पैसे प्रति रोगी खर्च करती है। जबकि हम प्रमुख अवसादग्रस्त देशों में शामिल हो चुके हैं। भारत में एक लाख लोगों पर मात्र एक मनोचिकित्सक है।

ऐसे हाल में हमें ही अपनी दुश्चिंताओं और तनाव पर काबू पाने के उपाय ढूंढऩे व आजमाने होंगे। इसमें योग-प्राणायाम काफी हद तक लाभकारी साबित हो सकता है। पत्रिका में इस बार अवसाद की समस्या पर ही विशेष सामग्री प्रकाशित की गई है। हमारी अपेक्षा है कि इस समय घर-घर की इस आम समस्या पर लोगों के साथ-साथ शासन भी ध्यान दे। अवसाद से मुक्ति पाने के लिए हमें मास्क, आइसोलेशन, वैक्सीन आदि की जरूरत नहीं है, केवल इच्छा-शक्ति और स्व-अनुशासन से इस पर काबू पाया जा सकता है। यदि हम दिमागी तनाव से उबर गए तो कोरोना भगाने में ज्यादा श्रम नहीं करना पड़ेगा। कोविड-19 के खिलाफ जंग का ‘हाफ मार्क’, अवसाद पर काबू पाकर हासिल किया जा सकता है। 

शोक व्यक्त- हमें यहां सूचित करते बड़ा दुख हो रहा है कि प्रेसवाणी परिवार के वरिष्ठ साथी श्री धीरेन्द्र जैन हमारे बीच नहीं रहे। 82 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया। वह कोरोना वायरस से संक्रमित हो गए थे। करीब 12 दिन इलाज चला पर स्वस्थ नहीं हो सके। धीरेन्द्र जी ‘प्रेसवाणी’ के संपादक मंडल में शुरू से ही रहे। वे हमेशा पत्रिका की प्रगति के लिए प्रयासरत रहा करते थे। ईश्वर उन्हें अपने श्री-चरणों में स्थान दे-यही हमारी प्रार्थना है। 

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