आकाश से गिरे खजूर पे अटके

— अनिल चतुर्वेदी

उम्मीद नहीं थी…कि कोरोना दौर की पीड़ा से बड़ी पीड़ा उसके बाद झेलनी पड़ेगी। एक वायरस ने हमारे रौंगटे खड़े कर दिए तो दूसरे वायरस ने महफूज बने रहने की खुशी हमसे छीन ली। राजतंत्र कोरोना से जन-बचाव के भरसक प्रयास कर रहा है, लेकिन साथ ही साथ कंगाली की पटकथा भी लिख डाली है। तभी तो सालभर के खौफनाक दौर में भी 40-50 नए अरबपति उभर आए, बाकियों की जेब काट जा रही है।
हम बात कर रहे हैं मंहगाई के कहर की। आम देशवासियों ने कोरोना काल के कष्टों को इस उम्मीद के साथ झेल लिया, कि अच्छे दिन आएंगे। सो, काली रात में भी उजियारी किरण की तलाश होती रही। मगर अफसोस, भोर की पौ फटते ही मंहगाई की घनी-काली बदरिया ने डेरा डाल दिया।
ये बात दीगर है कि कोरोना से बचाव में सरकार ने पानी की तरह पैसा बहाया है। ताकि बीमारी फैले नहीं और जनहानि कम से कम हो। मगर राजकोष के भार को कम करने अथवा नुकसान की भरपाई के बेरहम उपाय लागू कर दिए गए। इस समय प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष वसूली में जरा भी कंजूसी नहीं बरती जा रही है। राज का वसूली अभियान ये अहसास दिला रहा है कि उसे लोगों के काम-धंधे बंद हो जाने, नौकरी छिन जाने से उपजी शारीरिक व मानसिक पीड़ा महसूस ही नहीं हुई है। उसे इस समय सिर्फ अपना खाली खजाना भरने की सूझ रही है।
राजस्थान प्रशासनिक सेवा से आईएएस बनने जा रहे एक अधिकारी बताते हैं कि उन्हें अपने घर खर्च के लिए हर माह 500 से 1000 रुपए ज्यादा देने पड़ रहे हैं। यह सिलसिला पिछले साल मई से जारी है। अब जरा सोचिए, जब 80 से लाख रुपए या उससे ज्यादा का मासिक वेतन पाने वाले सरकारी अधिकारी को, साल में दो बार मंहगाई भत्ते में बढोत्तरी के बावजूद, मंहगाई की तपन महसूस होने लगी है तो असंगठित क्षेत्र के उन करोड़ों कामगारों अथवा वेतन भोगियों की क्या दुर्गति हो रही होगी, जो बमुश्किल दस से बीस हजार रुपए मासिक वेतन या मजूरी पाते हैं? इनको तो मंहगाई भत्ते की डोज तक नसीब नहीं होती। हालांकि सरकार ने रेहड़ी वालों को कर्ज के रूप में थोड़ी आर्थिक मदद पहुंचाई है, लेकिन जिसके लिए इस समय घर चलाना मुश्किल हो रहा है, वो भला कर्ज की अदायगी कैसे कर पाएगा? यदि नहीं कर पाएगा तो डिफॉल्टर हो जाएगा। तब उसके लिए बैंक लोन लेने के दरवाजे सदा लिए बंद हो जाने हैं।
मंहगीई के इस कुचक्र में फंसकर लोगों के परिवार समेत सुसाइड करने के मामले सामने आ रहे हैं। लोगों का सुख-चैन छिन गया है। मगर राजतंत्र बड़ी बेदर्दी से जनता पर कर, उपकर तथा अन्य शुल्क लादकर उसकी कमर ही नहीं तोड़ रहा, बल्कि आंकड़ों की बाजीगरी से सबकुछ नियंत्रण में होने और विकास का पहिया फिर दौडऩे का दावा भी कर रहा है। वर्तमान में कुल राजस्व का करीब 20 फीसदी तो केवल उपकर या सेस से ही आ रहा है। आकड़ों में आर्थिक मोर्चे की गुलाबी तस्वीर दिखाने का स्त्रोत उच्च वेतनभोगी सरकारी अमला और धनाड्य वर्ग है, जिनका शाही रहन-सहन समूचे देशवासियों पर भारी पड़ रहा हैं। इन दो अमीर तबकों ने आंकड़ों को तंदरुस्त रखकर सरकार को देशभर में तूफान-ए-मंहगाई फैलाने के दुस्साहस से भर दिया है। निरीह जन खर्चों के बोझ तले विरोध की आवाज तक उठाने की ताकत खो चुके हैं।
हमें पत्रिका के 11 वें वार्षिक अंक में मंहगाई का मुद्दा उठाने में तनिक भी हर्ष नहीं हो रहा है। जिस अंक में आम पत्र-पत्रिका के प्रकाशक सालभर की अपनी उपलब्धियां गिना कर पाठकों को प्रभावित करने का जतन करते हैं, हम अपनी पत्रिका के उसी अंक में आमजन की ‘मंहगी’ पीड़ा को प्रमुखता दे रहे हैं। अपने बारे में हम सिर्फ इतना ही कहेंगे कि प्रेसवाणी का 11 साल से नियमित प्रकाशन ही हमारी एकमात्र उपलब्धि है। ये पत्रिका बिना राजाश्रय के कैसे और क्यों निकल रही है, इन सवालों के जवाब फिर कभी….जब कोई संजीदगी से सुनना चाहेगा, तब।

One thought on “आकाश से गिरे खजूर पे अटके

  1. सर कृप्या मैगज़ीन का पीडीएफ भी उपलब्ध करवाए जी बहुत मेहरबानी होगी जी 🙏🙏

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