कोरोना बाद फैला महंगाई वायरस

— रतन मणि लाल
आँकड़े बड़े काम की चीज हैं। एक कहावत के अनुसार ये सबसे जरूरी तथ्य से ध्यान बंटाने और उसे छिपाने में बड़े काम आते हैं। जितना ज्यादा गूढ आँकड़े होंगे, उतना ही किसी समस्या की गंभीरता को कम करने में आसानी होगी। जीवन का यह एक ऐसा फलसफा है, जिसकी मदद से दुनिया भर की सरकारें अपनी घटती लोकप्रियता को बचाने में सफल होती आईं हैं।
वर्ष 2021 की शुरुआत में जब देश कोरोना वायरस के संकट से कुछ हद तक उबर रहा था, तब तक देश के मध्यम व कमजोर वर्ग के लोग महंगाई के ‘वायरस’ से व्यापक रूप से पीडि़त हो चुके थे। एक ओर लोगों की नौकरियां गईं, रोजगार के साधन समाप्त हो गए, कितने ही व्यवसाय पूरी तरह से बंद हो गए और दूसरी ओर लगभग हर जरूरी चीज के दामों में आए उछाल से घर चलाना मुश्किल हो गया।
इसी बीच जरा आंकड़ों पर नजर डालें। जनवरी में वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार दिसंबर 2020 में थोक मूल्यों पर आधारित (डब्ल्यूपीआई) महंगाई दर 1.22 प्रतिशत पर थी, जबकि पिछले साल जनवरी में यह 3.52 प्रतिशत पर थी। इसी आधार पर सरकारी तौर पर दावा किया गया कि खाने-पीने की चीजों की कीमतों में कमी आई है।
लेकिन घर-घर की कहानी तो यह है कि आंकड़ों से अलग, हर जरूरत की चीज के दाम पिछले कुछ महीनों में बेतहाशा बढ़े हैं, और अभी भी बढ़े जा रहे हैं।
इससे भी बड़ा विरोधाभास तो यह है कि देश के स्टॉक मार्केट में जबरदस्त उछाल देखा जा रहा है। सेंसेक्स सूचकांक ने ऐतिहासिक ऊंचाई छूते हुए 50,000 का आंकड़ा पार कर लिया। जो छोटे निवेशक शेयर बाजार से कमाई करते थे, उन्होंने हजारों रुपये प्रतिदिन के हिसाब से धन कमाया। वहीं, जो लोग शेयर बाजार के व्यवसाय से नहीं जुड़े हैं, उनके लिए रोज की महंगाई से निबटना कठिन होता जा रहा है।
जनवरी 2021 में सरकार ने माना कि मैन्यूफैक्चरिंग आइटम्स, फ्यूल, कच्चे तेल और नेचुरल गैस की कीमतों में बढ़ोतरी की वजह से जनवरी में तेजी से महंगाई बढ़ी। और अब पूरे देश में, शहरों से लेकर गाँव तक, हर तरह की चीजों के दाम बढ़ रहे हैं। अब, ऐसी आशंका है कि अगले कुछ महीनों में महंगाई रिकार्ड स्तर को छू सकती है।
आर्थिक आँकड़ों, अनुसंधान व सेवा प्रदाता एजेंसी आईसीआरए का मानना है कि मांग बढऩे से कीमतों को मजबूती मिलेगी, जिससे अप्रैल-जून तिमाही में कोर इन्फ्लेशन बढ़ कर 7-7.5 प्रतिशत तक जा सकती है। यही नहीं, वित्त वर्ष 2022 में थोक मूल्यों पर आधारित महंगाई 5-5.5 प्रतिशत के औसत पर रह सकती है।
कोविड की वजह से जो बेरोजगारी बढ़ी है, उसका सबसे अधिक असर अर्थ व्यवस्था के असंगठित क्षेत्र पर पड़ा है। इस क्षेत्र में उत्पादन घटा, लागत बढ़ी और इसकी वजह से सब्जी, खाने के समान, आदि के दाम बढ़े हैं।

आसमान पर पेट्रोल, डीजल
जरूरी वस्तुओं में सबसे ज्यादा आग पेट्रोल, डीजल और रसोई गैस (एलपीजी) के दामों में लगी है। जनवरी के बाद फरवरी में भी पेट्रोल-डीजल के दाम लगभग हर दिन बढ़ रहे और 16 फरवरी के आसपास राजस्थान के श्रीगंगानगर में साधारण पेट्रोल की कीमत 100 रुपये प्रति लीटर के पार चली गई।
पेट्रोल, डीजल व एलपीजी के दामों में लगातार बढ़ोतरी से जहां पेट्रोल-डीजल के दामों में हर दिन 26 पैसे प्रति लीटर से 40 पैसे प्रति लीटर की दर से वृद्धि होती रही, वहीं घरेलू रसोई गैस सिलेंडर के लिए सार्वजनिक क्षेत्र की तेल कंपनियों ने 14.2 किलो के घरेलू गैस सिलेंडर की कीमत में 50 रुपये प्रति सिलेंडर बढ़ाने का फैसला किया था। फिर, 4 फरवरी को गैर-सब्सिडी घरेलू गैस सिलेंडर के दाम 25 रुपए तक बढ़ा दिए गए।
पेट्रोल व डीजल के मूल्य में केंद्र व प्रदेश सरकारों के अलग अलग घटक शामिल हैं। भारत 85 फीसदी कच्चा तेल विदेशों से आयात करता है और कच्चे तेल के ग्लोबल बेंचमार्क पर इसकी कीमतें तय होती है। इसमें करेंसी एक्सचेंज रेट को भी ध्यान में रखते हैं। तेल कंपनियां कीमत के बाद टैक्स लगाती हैं। ट्रांसपोर्टेशन, डीलर कमीशन भी अलग से लिया जाता है। तेल कीमतों में सबसे ज्यादा एक्साइज और वैट लगता है।

सीएनजी भी मंहगी
मुंबई समेत जिन शहरों में सीएनजी और पीएनजी की आपूर्ति होती है, वहाँ इनके दाम बढ़े हैं। मुंबई और आसपास के क्षेत्रों में पाइप के जरिए गैस की आपूर्ति करने वाली कंपनी ने सीएनजी का भाव 1.5 रुपये प्रति किलोग्राम और पाइप से पहुंचाई जाने वाली घरेलू रसोई गैस (पीएनजी) का भाव 95 पैसा प्रति घन मीटर बढ़ाया है।
हड़ताल की चेतावनी
डीजल की बढ़ती कीमतों का विरोध करते हुए ट्रांसपोर्टरों के शीर्ष संगठन ऑल इंडिया मोटर ट्रांसपोर्ट कांग्रेस (एआईएमटीसी) ने हड़ताल पर जाने की चेतावनी दी है। एक बैठक के बाद इस संगठन ने अपनी मांगें सामने रखीं, जिनमें डीजल की कीमतों में तत्काल कमी और इसमें एकरूपता, ई-वे बिल व जीएसटी से संबंधित मुद्दों का समाधान और वाहनों को कबाड़ करने की नीति को अमल में लाने से पहले ट्रांसपोर्टरों के साथ इस बारे में चर्चा करना शामिल है। एआईएमटीसी लगभग 95 लाख ट्रक ड्राइवरों और लगभग 50 लाख बसों व पर्यटक ऑपरेटरों का प्रतिनिधित्व करने का दावा करता है।

विशेषज्ञों की राय
अनिल शर्मा, वेल्थ मेनेजमेंट विशेषज्ञ, कहते हैं कि शेयर बाजार में तेजी का एक बड़ा कारण है बाजार में ज्यादा से ज्यादा रकम का आना। विदेशी निवेशकों द्वारा भारत के बाजार में बड़े पैमाने पर रकम डाली जा रही है। दूसरे, कोरोना के घटते असर की वजह से, और पूरी दुनिया में कोरोना के विरुद्ध व्यापक टीकाकरण की वजह से भी कॉर्पोरेट क्षेत्र में सकारात्मक रुझान आए हैं, जो स्टॉक मार्केट में परिलक्षित हो रहा है। उनके अनुसार स्टॉक मार्केट में तेजी बहुत लंबे समय तक शायद न रहे, क्योंकि महंगाई का असर वहाँ भी दिखेगा ही।
यू.एस. तिवारी, चार्टर्ड एकॉउन्टेन्ट के अनुसार महंगाई बढऩे में जिन बातों का योगदान होता है, उनमें एक है चीजों की उपलब्धता में बाधा आना। सबसे पहले कोरोना काल में लॉकडाउन की वजह से मांग में अचानक कमी आई, लेकिन मांग की तुलना में सप्लाई में रुकावट अधिक रही। लिहाजा महंगाई का दबाव बढ़ा।
दूसरा, काफी समय से अंतर्राष्ट्रीय मार्केट में कच्चे तेल की कीमतें निचले स्तर पर चल रहीं थीं। अब उसमें तेजी से हो रही बढ़ोतरी की वजह से न केवल डीजल, पेट्रोल व रसोई गैस के दाम बढ़े, बल्कि माल ढुलाई की लागत भी बढ़ी, जिससे दाम बढ़े हैं।
तीसरा, अर्थ व्यवस्था में तेजी लाने के लिए सरकार द्वारा दिए गए आर्थिक पैकेज की वजह से भी महंगाई बढ़ी है।
प्रो. आर. रॉय चौधरी, अर्थ शास्त्री, कहते हैं कि कोविड की वजह से जो बेरोजगारी बढ़ी है, उसका सबसे अधिक असर अर्थ व्यवस्था के असंगठित क्षेत्र पर पड़ा है। इस क्षेत्र में उत्पादन घटा, लागत बढ़ी और इसकी वजह से सब्जी, खाने के समान, आदि के दाम बढ़े हैं। चूंकि सभी तरह के उत्पाद बनाने वाली कंपनियों को वर्ष 2020 में घाटा ही हुआ है, इसलिए कोरोना की स्थिति थोड़ी बेहतर होते ही उन कंपनियों ने अपने उत्पादों के दाम बढ़ा दिए हैं, जिससे वे अपना घाटा कम कर सकें। सरकार इस तरह से दाम बढऩा रोकने के लिए कुछ नहीं कर सकती।

और बढेगी मंहगाई
आने वाले समय में लगभग हर चीज के दाम बढऩे के आसार हैं। एफएमसीजी, ऑटो से ले कर स्टील कंपनियां अपने प्रोडक्ट्स के दाम बढ़ाने जा रही है। इसकी वजह से फ्रिज, टीवी, साबुन, तेल, गाडिय़ां सब महंगे होने जा रहे हैं। दरअसल कच्चे माल की कीमतों में बढ़ोतरी के चलते कंपनियों के पास दाम बढ़ाने के अलावा कोई रास्ता नहीं है। कंपनियों का मानना है कि कच्चे माल की कीमतों में बढ़ोतरी के चलते प्रोडक्ट्स बनाने की लागत बढ़ गई है, लिहाजा दाम बढ़ाना कंपनियों की मजबूरी है।
डब्बा-शीशी बंद खाने के उत्पाद, बिस्किट, साबुन, तेल, रोजर्मरा के इस्तेमाल वाली कई चीजों की कीमतों में बढ़ोतरी संभव है। कॉपर, अल्युमीनियम और स्टील के दाम बढऩे की वजह से टीवी, फ्रिज जैसे इलेक्ट्रिक उपकरण की कीमतों में 10 फीसदी तक का इजाफा हो सकता है। कंपनियों की दलील है कि एक तो इनपुट कॉस्ट बढ़ रहा है, दूसरी ओर माल की ढुलाई का भी खर्च बढ़ चुका है, जिसकी वजह से इन प्रोडक्ट्स के दाम बढ़ सकते हैं। अधिकतर ऑटो कंपनियों ने तो पहले ही दाम बढ़ाने के संकेत दे दिए हैं। वहीं बाइक सेगमेंट में भी सभी उत्पादक कंपनियों ने दाम बढऩे की बात कही है।

भत्ता बढऩे की आस
सरकारी कर्मचारियों की निगाह अब महंगाई भत्ते में बढ़ोतरी की घोषणा पर लगी है। अब ऐसी खबरें आ रहीं हैं कि केंद्र सरकार होली से पहले केंद्रीय कर्मचारियों के महंगाई भत्ते को लेकर बड़ा फैसला ले सकती है। पिछले साल कोरोना के कारण महंगाई भत्ते में बढ़ोतरी नहीं की गई थी। यही वजह है कि कर्मचारी केंद्र सरकार से इस बार कुछ ज्यादा की उम्मीद लगा रहे हैं। वर्तमान में कर्मचारियों और पेंशनरों को अलग-अलग महंगाई भत्ता दिया जा रहा है। केंद्रीय कर्मचारियों को 17 फीसदी महंगाई भत्ता मिलता है। ऐसा माना जा रहा है कि यदि सरकार केंद्रीय कर्मचारियों के हित में फैसला लेती है तो करीब 50 लाख केंद्रीय कर्मचारियों और 65 लाख पेंशनर्स को लाभ पहुंचेगा। अधिकतर राज्य सरकारें भी इसी तरह के निर्णय ले सकती हैं।

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