थमी बुजुर्गों की सक्रियता

— आभा शर्मा

भारत में वरिष्ठ नागरिकों की जनसंख्या बढ़ रही है। आंकड़े दर्शाते हैं कि बुजुर्ग 2001 में 7.5 प्रतिशत से बढक़र वर्ष 2026 में 12.5 प्रतिशत होने की सम्भावना है और 2050 तक ये 19.5 प्रतिशत से अधिक हो जाएंगे। विश्व स्वास्थ्य संगठन की एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में करीब 20 मिलियन वरिष्ठ नागरिक अकेले रहते हैं और आगामी दो दशकों में यह संख्या बढऩे वाली है।
हेल्प ऐज ने कोविड-19 के दौरान बुजुर्गों की वास्तविक स्थिति पर एक रिपोर्ट पिछले साल जुलाई में जारी की थी, जिसमें 17 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के बुजुर्गों का सर्वे किया गया था। रिपोर्ट में बताया गया कि 65 प्रतिशत बुजुर्गों की आय पर असर पड़ा है। सर्वे में शामिल करीब 71 प्रतिशत बुजुर्ग लोगों का कहना था कि लॉकडाउन के दौरान परिवार की रोजी-रोटी कमाने वाले व्यक्ति की आय पर असर पड़ा। उन्हें अपने जीवन की तो चिंता बढ़ी ही, इससे अधिक चिंता कोरोना संक्रमण को लेकर लोगों में व्याप्त भावनाओं को लेकर हुई।
इस सर्वे रपोर्ट से जाहिर है कि कोरोना ने सिर्फ 60 साल से ऊपर वाले लोगों को ही प्रभावित किया हो ऐसा नहीं है। हाँ, यह अवश्य है कि कोरोना से पूरी दुनिया में बड़ी संख्या में बुजुर्ग लोगों की मौत हुई है। शायद इसी कारण कोरोना काल के पहले सामान्य कामकाजी जीवन व्यतीत कर रहे, सक्रिय और स्वस्थ साठ पार के लोगों के क्रियाकलाप पर भी एक तरह से लगाम सी लग गई। लॉकडाउन खुलने के बाद के घोषित/अघोषित दिशा-निर्देश भी उनके लिए कुछ ऐसा ही इशारा करते हैं।
अति उत्साही युवा सोच
भारत की अधिकतर आबादी युवा है और कोरपोरेट जगत में वैसे भी बुजुर्गों के लिए काम के अवसर कम ही होते जा रहे हैं। वहां अमूमन ऐसा माना जाता है कि यदि आप युवा नहीं हैं, तो आपकी काबिलियत उतनी नहीं हैं, या आप कार्य संस्कृति में वैसे घुल-मिल नहीं पायेंगे या अपने युवा सहकर्मियों के मुकाबले आप कुछ नया करने की क्षमता नहीं रखते। कोरोना काल ने बुजुर्गों पर एक तरह से दोहरी मार की है, जिसमें उन्हें सक्रिय होने के बावजूद अवसर से वंचित किया जा रहा है। देवालयों, धार्मिक स्थानों सहित अनेक स्थलों पर प्रवेश के लिए जारी दिशा-निर्देश बुजुर्गों के लिए बहुत उत्साहवर्धक नहीं कहे जा सकते हैं। मसलन, बुजुर्ग सरकारी दफ्तरों में जाएंगे तो अधिकारी से लेकर बाबू तक उन्हें घर से निकलने के लिए टोकेंगे। सडक़ों पर पुलिसकर्मी उनसे सवाल-जवाब करते दिख जाएंगे। घर के भीतर तो नाती-पोते, बेटा-बहू हैं ही, दादा और दादी को बाहर कतई न निकलने की नसीहत देने वाले।
सरकार की महज एक सलाह को आदेश में कैसे बदला जाता है, ये इस कोरोना काल में बुजुर्गों को साथ हो रहे बर्ताव में साफ तौर पर देखा जा सकता है। अफसोस इस बात का है कि मीडिया तक सलाह को आदेश साबित करने में कोई कसर नहीं छोड़ रहा। इसके पीछे युवा मानसिकता काम करती नजर आती है। जैसा कि पूर्व में दिए गए आंकड़ों से स्पष्ट होता है कि भारत में अभी लगभग दस फीसदी बुजुर्ग आबादी है। गोया कि आबादी का बड़ा हिस्सा साठ साल से कम उम्र वाला है। ये बड़ा वर्ग पके बाल वाले को अंकल-आंटी बेझिझक पुकारता है। ये संबोधन स्वयं के चुस्त-दुरुस्त और अंकल-आंटी की शिथिलता का बोध करा देता है। यही युवा मानसिकता इस महामारी के दौर में बुजुर्ग को अति बूढ़ा और लाचार बना देने को आतुर लगती है।

उम्र को दी मात
हालांकि इस मानसिकता को गलत साबित करते ऐसे बहुत से 60 पार के लोग हैं, जो बेहतर जीवन शैली और सुविधाओं के चलते बिलकुल फिट हैं और अपनी-अपनी विशेषज्ञता वाले क्षेत्रों में योगदान देने में सक्षम हैं। सेहतमंद वरिष्ठ नागरिकों के विज्ञापन भी पिछले कुछ सालों से खूब दिखाई देे रहे हैं। मगर कोरोना काल में चाहते ना चाहते हुए भी एक तरह का पक्षपाती माहौल बन गया है। कई लोग अक्सर यह मान लेते हैं कि आप बुजुर्ग हैं तो आप रिटायर्ड ही होंगे, लेकिन हकीकत यह है कि बहुत से बुजुर्ग लोग पार्ट टाइम या फुल टाइम काम करते हैं। कहीं यह जरूरत के लिए होता है तो कहीं खुद को सक्रिय रखने के लिए या सेवानिवृत्ति के वक्त तक अधिक बचत राशि ना जोड़ पाने के कारण। कहीं वित्तीय सुरक्षा की दृष्टि से तो कहीं बोरियत से बचने के लिए बुजुर्ग काम करना चाहते हैं।
वैसे तो मजाक में अक्सर बुजुर्गों को यह सलाह दी जाती है कि ‘बहुत काम कर लिया, अब आराम करिये।’ या ‘अपना मन भगवत भजन में लगाइये, अपने शौक पालिये, बागवानी कीजिये, संगीत सुनिए, किताबें पढिय़े’ आदि आदि। पर हकीकत में ऐसा देखा गया है कि जो बुजुर्ग काम करना बंद कर देते हैं और सेवानिवृत्ति ले लेते हैं, वे अक्सर अवसाद, हृदयाघात आदि रोगों से ग्रस्त हो जाते हैं और जीवन में उनके पास एक तरह से कोई उद्देश्य नहीं रह जाता।
सक्रियता वाले क्षेत्र
हमने देखा है पत्रकारिता सहित लेखन, विधि, चिकित्सा, अभियांत्रिकी सहित अनेक क्षेत्रों में साठ-सत्तर आयु वर्ग या उससे अधिक उम्र के लोग बेहतरीन काम कर रहे हैं। किसी लेखक ने कहा भी है कि कार्य आपको अर्थ और उद्देश्य प्रदान करता है और इसके बिना जीवन अधूरा है। वारेन बफेट नब्बे साल की उम्र में भी सक्रिय हैं तो प्रोफेसर नॉंम चोमस्की जैसे लेखक भी 92 साल की उम्र में भी लिख रहे हैं। भारत में हम प्रसिद्ध लेखक और पत्रकार खुशवंत सिंह, कुलदीप नैय्यर आदि के नाम से तो परिचित हैं ही, जो अंतिम समय तक काफी सक्रिय रहे। इनफोसिस के सह संस्थापक नारायण मूर्ति (74) और सदी के महानायक कहे जाने वाले अमिताभ बच्चन अपनी उर्जा और परिश्रम से 78 साल की उम्र में भी युवाओं को मात दे रहे हैं! इसके अलावा राजनीति तो ऐसा क्षेत्र है, जिसमें बुजुर्गियत का ही बोलबाला है। दुनिया भर में हमने कई उम्रदराज सफल और सक्रिय राजनेताओं को देखा है। भारत में भी लाल कृष्ण अडवाणी, ज्योति बसु, डॉ. मनमोहन सिंह और प्रणब मुखर्जी, अटलबिहारी बाजपेयी और अब नरेन्द्र मोदी जैसी कद्दावर सियासी हस्तियां हैं, जिनकी नेतृत्व क्षमता एवं कुशल प्रबंधन का देश हमेशा ऋणी रहेगा।

सेहत पर पूरा ध्यान
वैसे, बुजुर्गों के प्रति कम आयुवर्ग के लोगों की सोच से इतर इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि कोरोना के मौजूदा दौर में बड़ी उम्र वालों के स्वास्थ को लेकर पूरी सावचेती बरती जा रही है। कोरोना वैक्सीन लगने के सघन अभियान का दूसरा चरण एक प्रकार से वरिष्ठ नागरिकों के लिए ही समर्पित रहा। पहले चरण में (16 जनवरी से शुरू) फ्रंटलाइन हेल्थ वर्कर्स को टीके लगाए गए तो 1 मार्च से शुरू हुए दूसरे चरण में 60 वर्ष से अधिक और 45 वर्ष से अधिक आयु वर्ग के उन लोगों को टीके लगाए गए हैं, जिन्हें कोई गंभीर स्वास्थ्य समस्याएँ हैं।
सरकार ने कोरोना की शुरूआत से ही साठ बरस से अधिक उम्र वाले लोगों को अधिक सावधानी बरतने की सलाह दी है जिसे शासनतंत्र ने आदेश मान लिया। हालांकि सरकार की सलाह इसलिए उचित मानी जाएगी, क्योंकि बुजुर्गों में संक्रमण का खतरा अधिक होता है। जहां तक कोरोना पीडि़तों का सवाल है तो फरवरी माह में आई इंडियन कौंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च के तीसरे सीरो सर्वे की रिपोर्ट के मुताबिक देश का हर पांचवां युवा और चौथा बच्चा कोविड का शिकार हो चुका है।
सर्वे में पाया गया कि 21.4 प्रतिशत लोग कोरोना संक्रमित हो चुके हैं और इनमें से अधिकतर को खुद के कोरोना संक्रमित होने की जानकारी नहीं थी। पर इनकी कोरोना जांच में इनके शरीर में एंटीबॉडी पाई गई। यह सीरो सर्वे 7 दिसंबर 2020 से 8 जनवरी 2021 के बीच देश के 21 राज्यों में किया गया था, जिसमें 28,589 का एंटीबॉडी टेस्ट किया गया।
इस सीरो सर्वे की रिपोर्ट से पुष्टि होती है कि कोविड-19 महामारी ने सभी उम्र और वर्ग के लोगों को चपेट में लिया है। लिहाजा इस वायरस से बचाव की नसीहत पूरे जोर के साथ केवल बुजुर्गों को देना और बाकी सबका लापरवाह हो जाने का ही नतीजा है कि कोरोना की दूसरी लहर तेजी से फैलती जा रही है।

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  Change )

Connecting to %s

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.