…फिर भी ढूंढी व्यस्तता

— हेमलता चतुर्वेदी
जिंदगी जिंदादिली का नाम है। इसीलिए तो उम्र का हर पड़ाव इसे अपने नजरिये से देखता है। बात जब बुजुर्गों की आती है तो जिंदगी जरा संभल कर चलने, अपना खयाल रखने को कहती है, लेकिन उम्रदराज शरीर और झुर्रियों में छिपा मन कहता है ‘अभी मैं थका नहीं हूं।’ मन और उम्र की जुगलबंदी अगर लयबद्ध रहे तो उम्र की यह सांझ अत्यंत खुशगवार और सदुपयोगी बन जाती है। कोरोना काल में वृद्धजनों को सरकारी संदेश, चिकित्सकों की राय, पास-पड़ोस और अपनी संतानों से यही सुझाव अनवरत मिला -‘आप अपना खयाल रखिए।’ यह संदेश सिर्फ इसलिए कि कोरोना जानलेवा महामारी है। संदेश सभी के लिए था, लेकिन आने-जाने, मिलने-जुलने पर लगी पाबंदी कुछ हद तक बुजुर्गों पर ज्यादा प्रभाव डालती नजर आई।
क्योंकि इस सेवानिवृत्त पीढ़ी की दिनचर्या सुबह-शाम की सैर, रोजमर्रा के पार्क में आने वाले अपने साथियों से मिलना और रिश्तेदारों, मित्रों से मिलने व बातचीत के इर्द-गिर्द ही घूमती थी। पार्क में घूमने के साथ आपसी संवाद से दिन की शुरुआत में ही मन कुछ हल्का और स्फूर्ति भरा हो जाता तो दिन भर अच्छा निकलता। किंतु लॉकडाउन के चलते कितने ही लोगों की यह गतिविधि बंद हो गई। इससे थोड़ा-बहुत असर तो जरूर पड़ा, लेकिन यह अनुभवी पीढ़ी हताश नहीं हुई। कोरोना संबंधी सारी गाइडलाइन का पालन करते हुए कुछ लोगों ने घर पर ही अपनी रुचि के कार्य करने शुरू कर दिए। जैसे, अपने घर-आंगन में लगे पेड़-पौधों की सार-संभाल, समसामयिक विषयों पर घर में ही चर्चा करना आदि। कुछ ने पोते-पोतियों को पढ़ाया। हालांकि इनके बीच ऐसे बुजुर्ग भी रहे जो कोरोना के कारण लगी पाबंदियों के साथ तारतम्य नहीं बिठा पाए। उनमें जरूर कुछ हताशा घर कर गई।
इनमें वो बुजुर्ग महिलाएं भी रहीं, जो आम दिनों में हर सेल में चली जातीं, बाजार से अपने मन-पसंद कपड़े लातीं या किसी पार्टी के नाम पर ही एकत्र हो जाती थीं। वे कोरोना संबंधी सावधानियां बरतने के लिहाज से इन सभी गतिविधियों से दूर हो गईं। इसका कुछ महिलाओं पर थोड़ा नकारात्मक असर हो सकता है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि सभी महिलाएं इससे आहत हैं। आखिर यह बात महिलाओं से ज्यादा कौन जानता है कि थोड़ा बहुत अनुशासन जीवन संवार सकता है। कितने ही परिवार हैं, जहां ज्यादातर महिलाओं ने ही घरवालों के लिए कोरोना नियमों की कड़ी पालना की जिम्मेदारी ले रखी है। घर-परिवार के सदस्यों के लिए मास्क, सेनेटाइजर के इस्तेमाल को सुनिश्चित करने का जिम्मा हर कार्य की तरह महिलाओं ने ही ले रखा है।
माना कोरोना संक्रमण से कई वृद्धजन की भी जानें गईं, लेकिन इस वायरस ने युवाओं को भी अपना शिकार बनाया है। यहां सावधानी की भूमिका अधिक है। इसलिए केवल बुजुर्ग ही इससे मानसिक तनाव में आ जाएं, यह ठीक नहीं। संपूर्ण परिवेश पर नजर डाली जाए तो ऐसा लगता भी नहीं। टीवी पर आने वाला हर चौथा विज्ञापन देख लीजिए, बुजुर्गों को अधिक आशावान दिखाया जा रहा है। सही भी है, सारी उम्र काम करने के दौरान जितनी व्यस्तताएं इंसान ओढ़े रहता है, उसे कुछ भी सोचने-समझने का समय ही नहीं मिलता। इसीलिए तो कहा जाता है कि जीवन सेवानिवृत्ति के बाद शुरू होता है। इस वक्त इंसान हर उस कमी को पूरा करना चाहता है, जो वह नौकरी और घर के बीच की जिम्मेदारियां निभाते हुए नहीं कर पाया। जीवन बीमा के कितने ही रिटायरमेंट प्लान इसी सोच को रेखांकित करते हैं।
हां, एक बात अवश्य है कि बुजुर्ग सैर-सपाटे और दूसरे शहरों में रहने वाले रिश्तेदारों के घर नहीं जा सकते। परन्तु इसका फायदा यही है कि संक्रमण से दूर रहेंगे। टीवी विज्ञापन के अलावा राजनीति के क्षेत्र में देख लीजिए अमरीकी राष्ट्रपति जो बाइडेन से लेकर भारतीय नेताओं तक सब करीब-करीब 60 प्लस की उम्र के हैं और सक्रिय हैं। चुनाव के कारण इन दिनों अधिक सक्रिय हैं। इसलिए यह समझ लेना और मान बैठना ठीक नहीं कि हम तो पहले से ही असहाय थे, कोरोना के कारण और लाचार हो गए। कुछ बुजुर्ग जिन्हें वैसे ही किसी बीमारी के चलते ज्यादातर समय घर पर रहना है या चिकित्सक ने आराम करने की सलाह दी हुई है। उनके अलावा ऐसे वृद्धजन जो आराम से चल-फिर सकते हैं, वे अपने घर की चारदीवारी के भीतर या आस-पास घूमते नजर आ ही रहे हैं। मास्क पहनना और दो गज दूरी का पालन करना जरूरी है, जो वे कर भी रहे है। रही बात घरेलू माहौल की, तो यह हर परिवार का दायित्व है कि महामारी के संकट के बीच घर पर बुजुर्गों के लिए सकारात्मक माहौल बनाए रखें, ताकि यह समय आसानी से कट जाए।
हालांकि कोरोना एक साल बाद तक जारी है और नए स्ट्रेन से लेकर इससे जुड़ी तमाम पेचीदिगियां विज्ञान के लिए चुनौती बनी हुई हैं। मगर समझदारों ने मान लिया है कि दो गज दूरी और मास्क जरूरी। यह बीमारी इस संसार से कब रूखसत होती है, यह फिलहाल कोई नहीं जानता, लेकिन सकारात्मकता और उम्मीद से बड़ा कोई साथी नहीं। इसलिए उम्मीद न छोड़े क्योंकि –
दिल नाउम्मीद तो नहीं, नाकाम ही तो है
लंबी है गम की शाम, मगर शाम ही तो है।

पहले आम दिनों में मैं कॉलोनी के पार्क में घूमने चली जाया करती थी। मन बदल जाता था,वहां और भी हमारी उम्र के साथी आते थे, लेकिन कोरोना के कारण अब तो पार्क के गेट को छूने से पहले लगता है कि कहीं यह संक्रमित तो नहीं। सेनेटाइजर लगाना पड़ेगा। अब तो परिस्थिति के अनुरूप रहने में ही भलाई है। इसलिए अब मैं अपने घर के लॉन में ही सुबह-शाम चक्कर लगा लेती हूं। आखिर जान है तो जहान है।

  • कौशल्या शर्मा, (परिवहन विभाग से सेवानिवृत्त)
    सबसे ज्यादा तो परेशानी यही रही कि हर समय कोरोना का डर सताता रहा। इसलिए इस उम्र में थोड़ी घबराहट जरूर हो जाती है, लेकिन टीवी पर इतने सारे चैनल हैं कि समाचार से लेकर आध्यात्मिक कार्यक्रम तक देखे जा सकते है। बुजुर्गों की एक परेशानी यह है कि अन्य बीमारियों के इलाज के लिए भी अस्पताल जाने से बच रहे हैं, क्योंकि संक्रमण का डर है। हालांकि इसका एक फायदा यह हुआ कि मामूली बीमारी में खुद को संभालना सीख गए। एक फायदा यह भी हुआ कि बाहर का खाना-पीना बंद हुआ। इससे फिर से घर का शुद्ध खाना खाने की आदत हो गई। इस महामारी ने ये फायदे दिला दिए।
  • डा.कृष्णा रावत, (लेखा विभाग से सेवानिवृत्त)
    शहर से कुछ दूर बड़े आवासीय कॉम्प्लेक्स में रहते हैं। लॉकडाउन खुलने के बाद परिसर में इस बात का विशेष ध्यान रखा गया कि वरिष्ठ निवासी स्थितियां थोड़ी बेहतर होने तक आवाजाही कम करें तो ही ठीक होगा। मास्क पहनने और सैनेटाईजेशन आदि के नियम का पालन तो वैसे सभी आयु वर्ग के लिए सुनिश्चित किया जा रहा है। – श्रीमती नीति, गृहणी
    कोरोना के कारण कुछ पाबंदियों का सामना जरूर करना पड़ रहा है, लेकिन हम साहित्य कर्म से जुड़े हैं। इसलिए हमने इस समय का सदुपयोग अच्छे लेखन कार्य में किया। मन को शांत रख सारी पाबंदियों को अनुशासन की तरह अपनाते हुए अपनी दिनचर्या खुशी-खुशी चला रहे हैं। मैं अपने घर की सारी गतिविधयों में सक्रिय रहती हूं। घर के लॉन में लगे पेड़-पौधों की सार-संभाल करती हूं। इससे मन बहल जाता है। इस दौरान घर के बाहर से आते-जाते लोगों से कभी कभार दूर से ही दुआ-सलाम हो जाती है।
  • श्रीमती राज चतुर्वेदी, लेखिका
    असर तो सब पर ही पड़ा है। सबसे बड़ा तो हमेशा संक्रमण का डर बना रहता है। दूसरे शहरों की यात्रा तो दूर घर के सामने बने पार्क में ही घूमने जाना मुश्किल है। खान-पान में सुधार किया है। योग-प्राणायम करके मन को सकारात्मक रखता हूं। सकारात्मक सोच से ही जीवन जीना उचित है। इसी आशा के साथ सारे नियमों की पालना करते हुए कोरोना संकट के दिन भी निकल जाएंगे। हां, इस बात से जरूर पीड़ा होती है कि हम वृद्धजन वैसे ही सतर्कता बरत रहे हैं, उसपर भी जब सामने वाला हमे घरबंदी में रहने का हुकुम देता है तो लगता है कि क्या हम समाज से बिलकुल अलग-थलग किए जा रहे हैं। – मोहन लाल शर्मा, विद्युत विभाग से सेवानिवृत्त
    कोविड काल से पहले कॉलोनी के पार्क में करीब तीन किलोमीटर तक रोज घूमते था। अब सैर का ये क्रम बंद ही हो गया है। घर के पास वाले पार्क में सैर को आने वाले अधिकतर लोग 60 पार के ही होते थे पर अब पार्क सूना सा ही रहता है। कोरोना का डर इस सीमा तक हो गया है कि घर से बाहर निकलने की हिम्मत करना भी चाहो तो पत्नी कहेंगी घर पर ही घूम लो। लॉकडाउन खुलने के बाद कुछ काम से बाजार गए तो दुकानदार ने सामान बाद में दिया, सलाह पहले ‘सर, उम्र के हिसाब से बाहर कम निकलिए।’
  • सतीश शर्मा (सेवानिवृत्त, ए.जी. ऑफिस)
    धार्मिक स्थानों और मंदिरों में प्रवेश के लिए तो 60 पार वाले लोगों के लिए एडवाइजरी तो पहले से ही थी, होटल इंडस्ट्री में भी 65 साल से ऊपर और गंभीर बीमारियों से पीडि़त व्यक्तियों, गर्भवती महिलाओं और दस साल से कम उम्र के बच्चों को, बहुत ही आवश्यक और स्वास्थ्य कारणों के अलावा, घर पर ही रहने की सलाह दी गई है। ऐसे में इच्छा हो तो भी घर से निकलने की हिम्मत नहीं होती। अब तो बस, यही कामना है कि यह महामारी जल्दी ही खत्म हो। – राकेश टिक्कू, सेवानिवृत्त बैंक अधिकारी

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