सूचना आयोग में नौकरशाहों की पक्षपाती कार्यशैली

केन्द्र औऱ राज्यों के सूचना आयोगों में नौकरशाहों की नियुक्ति पर जोर दिए जाने का कड़वा सच सामने आया है। पूर्व सरकारी बाबुओं ने सूचना आयुक्त रहते अपनी जमात पर जमकर कृपा बरसायी है। एक रिपोर्ट के मुताबिक सूचना का अधिकार (आरटीआई) कानून  के तहत विभिन्न सूचना आयोगों ने केवल एक साल में ही 95 फीसदी मामलों में सरकारी अधिकारियों पर जुर्माना नहीं लगाया, जबकि वे जुर्माना लगा सकते थे।

आरटीआई कानून पर काम करने वाले एक समूह सतर्क नागरिक संगठन की यह रिपोर्ट आरटीआई कानून की 16वीं वर्षगांठ की पूर्व संध्या पर जारी की गई। इसमें केंद्रीय सूचना आयोग सहित 20 सूचना आयोगों पर अध्ययन किया गया है। सूचना का अधिकार (आरटीआई) अधिनियम 12 अक्टूबर, 2005 को लागू हुआ था।

सतर्क नागरिक संगठन ने बयान जारी कर बताया कि इसमें मामलों का निपटारा और उनके द्वारा लगाए गए जुर्माने के आंकड़े समाहित हैं। समूह ने एक पूर्ववर्ती सांख्यिकीय विश्लेषण का प्रयोग किया है, जिसमें इसने दावा किया कि 59 फीसदी फैसलों में आरटीआई कानून की धारा 20 के तहत सूचीबद्ध एक या अधिक उल्लंघन किए गए। इसमें इस निष्कर्ष पर पहुंचा गया कि आयोगों ने इस दौरान 95 फीसदी मामलों में जुर्माना नहीं लगाया।

समूह ने बयान जारी कर कहा, अगर 59 फीसदी मामलों का आकलन किया जाए तो 20 सूचना आयोगों द्वारा निस्तारित 69,254 मामलों में से 40,860 मामलों में जुर्माना लगाया जा सकता था। जुर्माना केवल 4.9 फीसदी मामलों में लगाया गया। इस तरह से सूचना आयोगों ने 95 फीसदी मामलों में जुर्माना नहीं लगाया, जहां जुर्माना लगाया जा सकता था। आरटीआई कानून के तहत 30 दिनों के अंदर आवश्यक रूप से सूचना देनी होती है और ऐसा नहीं करने पर जन सूचना अधिकारी पर प्रतिदिन 250 रुपये का जुर्माना और अधिकतम 25 हजार रुपये तक का जुर्माना लगाया जा सकता है। कानून के अनुसार जनसूचना अधिकारी के वेतन से यह जुर्माना वसूला जाता है।

इस कानून ने लाखों लोगों को सूचना प्राप्त करने और सरकार को जवाबदेह ठहराने का अधिकार दिया है। आरटीआई कानून के तहत सूचना आयोग अंतिम अपीलीय प्राधिकरण होते हैं। सूचना आयोग केंद्रीय स्तर (केंद्रीय सूचना आयोग- सीआईसी) और राज्यों (राज्य सूचना आयोग) में स्थापित किए गए हैं।

सतर्क नागरिक संगठन ने देशभर में सूचना आयोगों के प्रदर्शन पर आरटीआई एक्ट के तहत प्राप्त जानकारी के आधार पर ये रिपोर्ट तैयार की है। रिपोर्ट भारत में सभी 29 आयोगों के प्रदर्शन के बारे में है। आरटीआई एक्ट के कार्यान्वयन की स्थिति पर आई एक अन्य रिपोर्ट के अनुसार देशभर में आरटीआई आवेदकों के उत्पीड़न और हत्या के मामले बढ़ रहे हैं और आने वाले वर्षों में उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करना सबसे बड़ी चुनौती है। ‘ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल इंडिया’ द्वारा जारी रिपोर्ट में कहा गया है कि पिछले 15-16 वर्षों में कम से कम 95-100 आरटीआई आवेदकों की हत्या हुई है, जबकि 190 अन्य पर हमला किया गया। रिपोर्ट में कहा गया है कि कई ने आत्महत्या की और उनमें से सैकड़ों ने शक्तिशाली लोगों द्वारा उन्हें परेशान किए जाने की सूचना दी।

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