सिर्फ प्रचार, काम नहीं

अब मीडिया शुद्ध व्यवसायी तो राजनेता सत्ता-पिपासू बन गए हैं। मीडिया को बेहिसाब पैसे कमाने हैं। इसके लिए मैनेज होने या गोदी बनने में उसे जरा भी संकोच नहीं रहा। राजनेता कुर्सी के लिए गोदी मीडिया पर राजकाज तक का पैसा लुटाकर उसका भरपूर दोहन कर रहे हैं। कीमत जन-विकास को चुकानी पड़ रही है।
सरकारी विज्ञापनों की रेवडिय़ां बांटे जाने के रिकॉर्ड, साल दर साल टूट रहे हैं। ताकि धनवर्षा के सराबोर मीडिया सत्ताधारियों की ऐसी तगड़ी ब्रांडिंग करे कि कुर्सी सदा-सदा के लिए बनी रहे। विज्ञापनों के लिए पैसों की कमी आने ही नहीं दी जा रही। भले ही विज्ञापित योजना या कार्यक्रम की वित्त के अभाव में बलि चढ़ जाए। तभी तो आवंटित बजट योजना पर कम, उसके मीडिया प्रचार पर ज्यादा खर्च किया जा रहा है। योजना से जितना भी बड़ा जनहित जुड़ा हो, वो मतलब नही रखता। योजना के जबरदस्त प्रचार से राजनेता की ब्रांडिंग मतलब रखती है।
लगभग पूरे देश में यही माहौल है। राजनेता साफ-साफ कहने भी लगे हैं कि विज्ञापन तभी जब उनकी ही बात हो। जिस मीडिया ने इतर रुख अपनाया, उसके विज्ञापन बंद। फिर भी रुख नहीं बदला तो सार्वजनिक खिंचाई के साथ-साथ जांच एजेंसिंयों के छापे और धमकियां मिलना शुरू। मतलब, खबर की खबर लेने वाले तटस्थ मीडिया पर ताले लगवाने के हर एक पैंतरे की आजमाइश करना अब नेताओं का शगल बन चुका है।
इधर, पैसों की खातिर राज के शरणागत हुए प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की विश्वसनीयता इस कदर प्रभावित हुई है कि उसकी सारी की सारी खबरें, डिबेट आदि समझौते वाले लगने लगे हैं। अक्सर किसी मुद्दे पर एक जैसी खबरें सभी बड़े अखबारों तथा न्यूज चैनलों पर नजर आने लगी हैं। मानो ऊपर से निर्देश मिले हों कि जो सूचना जारी की जा रही है, वो हू-ब-हू जनता को परोसी जाए, जरा-सा भी संपादन न हो। कुल मिलाकर, राजकोष के दम के आगे, ईमान बेदम हो चुका है।
प्रस्तुत अंक में ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ जैसी अति महत्वपूर्ण सरकारी योजनाओं को राजनेताओं द्वारा खुद की ब्रांडिंग का जरिया बना लेने को प्रमुख मुद्दे का रूप दिया गया है। इस योजना से देश की कितनी बेटियों के दिन फिर गए, इसका तो पता नहीं। लेकिन हमारे प्रधानसेवक की ब्रॉडिंग पर योजना के कुल बजट का 80 फीसदी तक खर्च किए जाने के खुलासे से योजना के हश्र का अंदाजा लगाया जा सकता है।

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