होम मेकर क्यों घरेलू हिंसा की पक्षकार?

  • हेमलता चतुर्वेदी –
    पितृसत्तात्मक समाज की अवधारणा औऱ महिला सशक्तिकरण पर काफी समय से बहस छिड़ी हुई है। लोग कह सकते हैं कि राजनीतिक हलकों में यह बहस चल रही है, जमीनी स्तर पर इसके कोई मायने नहीं हैं। यह कहना पूरी तरह गलत भी नहीं है। क्योंकि बाल विवाह संबंधी कानूनों के बावजूद देश में हर साल बाल विवाह हो ही रहे हैं। सवाल दरअसल यह है कि महिला संबंधी मामले समस्या बने रहें और उनका हल न हो, इसमें किसकी भलाई है? राजनेताओं की या महिला संगठनों की? समाज की तो बिल्कुल नहीं हो सकती है।
    महिलाओं से जुड़ा एक गंभीर मसला है घरेलू हिंसा का है। कितने ही सर्वे करवा लिए गए, लेकिन हालात आज भी जस के तस हैं। चौंकाने वाला तथ्य यह है कि कई जगह महिलाएं तक घरेलू हिंसा को जायज बता रही हैं। ऐसे में क्या उम्मीद की जा सकती है? क्या कभी हालात बदलेंगे?
    हाल ही हुए एक सर्वे में एक बार फिर इस बात की पुष्टि हुई है कि देश की महिलाएं घरेलू हिंसा के मामले छिपा जाती हैं। 11 राज्यों और एक केंद्र शासित प्रदेश में 70 प्रतिशत से अधिक महिलाओं ने घरेलू हिंसा को लेकर कभी मदद नहीं मांगी और न ही किसी को इस बारे में बताया। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस) ने यह सर्वे करवाया है।
    80 फीसदी तक शिकार
    सर्वे के अनुसार चार राज्यों और केंद्र शासित प्रदेश जम्मू कश्मीर में ऐसी महिलाओं का अनुपात 80 प्रतिशत से अधिक रहा। इनमें असम (81.2 प्रतिशत), बिहार (81.8 प्रतिशत), मणिपुर (83.9 प्रतिशत), सिक्किम (80.1 प्रतिशत), और जम्मू कश्मीर (83.9 प्रतिशत) शामिल हैं। इसके अलावा सात राज्यों में 70 प्रतिशत से अधिक महिलाओं ने कभी मदद नहीं मांगी और न ही किसी को खुद सहन की गई हिंसा के बारे में बताया। इनमें त्रिपुरा (76 फीसदी), तेलंगाना (71 फीसदी), पश्चिम बंगाल (76.3 फीसदी), महाराष्ट्र (76.4 फीसदी), गोवा (75.7 फीसदी), गुजरात (70.6 फीसदी) और आंध्रप्रदेश (79.7 फीसदी) शामिल हैं। आठ राज्यों में 10 प्रतिशत से भी कम महिलाओं ने शारीरिक हिंसा से बचने के लिए मदद मांगी। इनमें असम (6.6 प्रतिशत), आंध्र प्रदेश (7.7 प्रतिशत), बिहार (8.9 प्रतिशत), गोवा (9.6 प्रतिशत), हिमाचल प्रदेश (9.6 प्रतिशत), जम्मू और कश्मीर (7.1 प्रतिशत), मणिपुर (1.2 प्रतिशत) प्रतिशत) और नगालैंड (4.8 प्रतिशत) शामिल हैं।

क्यों हिचकती हैं
महिलाओं का घरेलू हिंसा को लेकर खुल कर सामने न आने का एक बड़ा कारण यह है कि ज्यादातर महिलाएं इस बात से डरती हैं कि जिससे मदद मांगेंगे, वह भी परिवार का ही करीबी होगा। एक तो परिवार की इज्जत पर सवाल उठेंगे, दूसरा मदद का भरोसा भी नहीं। हो सकता है मददगार लगने वाला रिश्तेदार भी महिलाओं को ही ‘एडजस्ट’ करने की नसीहत दे दे। सर्वे में पाया गया कि मदद का स्रोत उनका अपना परिवार, पति का परिवार, पड़ोसी, पुलिस, वकील और धर्मगुरु थे। एक रिपोर्ट के अनुसार महिलाओं द्वारा अनुभव की जाने वाली वैवाहिक हिंसा में- खरोंच, चोट, दर्द, आंखों की चोट, टूटी हुई हड्डियां, गंभीर जलन, टूटे दांत, मोच और या हड्डी खिसक जाना शामिल थे।

महिलाएं ही बतातीं जायज
राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस) में पुरुषों की तुलना में ज्यादा महिलाओं ने पति द्वारा मारपीट को जायज बताया है। देश के 18 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेश जम्मू कश्मीर में किए गए नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे में पूछा गया कि आपकी राय में क्या पति का पत्नी को मारना या पीटना सही है? इसके जवाब में तेलंगाना की 83.8 फीसदी महिलाओं ने कहा कि पुरुषों का अपनी पत्नियों को पीटना जायज है, जबकि हिमाचल प्रदेश में 14.8 फीसदी महिलाओं ने इसे जायज बताया। जिन राज्यों में घरेलू हिंसा को जायज ठहराने वाली महिलाओं का प्रतिशत अधिक रहा,वे हैं- आंध्र प्रदेश (83.6 फीसदी), कर्नाटक (76.9 फीसदी), मणिपुर (65.9 फीसदी) और केरल (52.4 फीसदी)। पूरे देश के एनएफएचएस-4 (2015-2016) के आंकड़े जनवरी 2018 में जारी हुए थे, जिसमें कहा गया था कि सर्वे में शामिल 52 फीसदी महिलाओं का मानना है कि पति का अपनी पत्नी को पीटना सही है, जबकि 42 फीसदी पुरुष इससे सहमत थे। महिलाओं में गिरती प्रजनन दर और बैंक एकाउंट में बढ़ोतरी से महिला सशक्तिकरण का पता चलता है, लेकिन नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे में घरेलू हिंसा को लेकर चौंकाने वाले आंकड़े सामने आए ।
घरेलू हिंसा के 7 कारण
सर्वे में पत्नियों को मारने या पीटने के सात कारण सामने आए, जिसमें पति को बिना बताए बाहर जाना, घर और बच्चों को संभालने में लापरवाही बरतना, पति से बहस करना, शारीरिक संबंध बनाने से इनकार करना, सही तरीके से खाना न बनाना, धोखा देना या सास-ससुर का सम्मान नहीं करना शामिल हैं। इनमें सबसे आम कारण सास-ससुर का सम्मान न करना और घर व बच्चों को नजरअंदाज करना बताया गया। 18 में से 13 राज्य मणिपुर, गुजरात, नगालैंड, गोवा, बिहार, असम, महाराष्ट्र, कर्नाटक, तेलंगाना, हिमाचल प्रदेश, केरल और पश्चिम बंगाल की महिलाओं ने पति द्वारा पिटाई की सबसे जायज कारण सास-ससुर का सम्मान नहीं करना बताया। इसके बाद दूसरा कारण घर और बच्चों को सही तरीके से संभालना नहीं बताया गया। पति द्वारा पिटाई का सबसे कम कारण पति को धोखा देना भी बताया गया।
माना देश के सामाजिक ढांचे में महिलाएं ही परिवार की धुरी हैं, इसलिए घर संभालने की जिम्मदारी अप्रत्यक्ष रूप से महिला की ही मानी जाती है। लेकिन इस सम्मानजनक जिम्मेदारी की अहमियत महिलाओं को स्वयं समझनी होगी। अपने प्रति जागरुक होना होगा। एकजुटता के साथ विचारधारा बदलने की जरूरत है। समाज का ही एक वर्ग ऐसा है, जहां आज गृहिणी ‘होम मेकर’ कहलाती है तो दूसरा वर्ग अब भी इतना पिछड़ा क्यों? महिला संगठनों को ही यह ‘सामाजिक साक्षरता’ लानी होगी, ताकि समाज के हर वर्ग तक महिला आत्म सम्मान की रोशनी पहुंचे और महिलाएं खुद पर हिंसा को तो कम से कम गलत मानना और कहना शुरू करें। ठ्ठ

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