यूपी चुनाव की अहमियत

— ​अनिल चतुर्वेदी —
उत्तर प्रदेश का ये विधानसभा चुनाव फिलहाल भाजपा ही जीतती नजर आ रही है। हालांकि मीडिया, अटकलों का अंबार लगाए दे रहा है। इनमें मुकाबला कांटे का बताया जा रहा है, जिसमें भाजपा के टक्कर में सिर्फ समाजवादी पार्टी (सपा) मानी जा रही है। मगर कांग्रेस ने पिछले कुछ सालों में जो प्रयोग किए हैं और चुनाव के टिकट वितरण में जो साहस दिखाया है, उसके मद्देनजर यह पार्टी भी अपनी स्थिति बेहतर कर सकती है।
इस अंक में यूपी के चुनावों को ही खास मुद्दा बनाया गया है। शुरुआती दो आलेखों में चुनाव को लेकर विस्तारित विश्लेषण किया गया है। इनमें यही बात उभर कर सामने आई है कि सत्तारूढ़ भाजपा के सामने ज्यादातर विपक्षी दल फीके दिखाई दे रहे हैं। एकमात्र सपा कड़ी चुनौती देती लग रही है। लेकिन प्रदेशवासी सपा के पिछले राज को देख चुके हैं। उस दौरान माफियाओं की हरकत से उपजी असुरक्षा को लोग यदि भूले नहीं होंगे तो भाजपा की सत्ता को खतरा नहीं है।
यूपी के साथ-साथ चार अन्य राज्यों में भी विधानसभा चुनाव हो रहे हैं। किंतु हमने केवल यूपी के चुनावी समर पर फोकस किया है। क्योंकि राष्ट्रीय राजनीति का मार्ग इसी प्रदेश से होकर गुजरता है। दिल्ली के सत्ताधारी भाजपाई भी मानते हैं। तभी तो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, उनके खास रणनीतिकार गृहमंत्री अमित शाह तथा भाजपा के अन्य केन्द्रीय नेता और संघ ने पूरा जोर यूपी में ही लगा रखा है। लगाएं भी क्यों न, इस प्रदेश का राजनीतिक महत्व जो है। यूपी से ही सर्वाधिक लोकसभा सदस्य (80) तथा राज्यसभा सदस्य (31) चुने जाते हैं। बाकी राज्यों से यूपी से आधे भी सांसद (संसद के दोनों सदनों के लिए) नहीं चुने जाते हैं। दूसरे नंबर पर महाराष्ट्र आता है, जहां से 48 लोकसभा और 19 राज्यसभा सदस्यों का निर्वचन होता है।
कुल 111 संसद सदस्य चुनने वाला उत्तर प्रदेश पूरे देश की एक प्रकार से सियासी धुरी है। भाजपा 2014 के आमचुनाव से ही इस प्रदेश की सत्ता पाने को आतुर रही है। उसका सपना 2017 में पूरा हुआ, जब प्रचंड बहुमत से भाजपा यहां जीती। चूंकि मोदी औऱ शाह केन्द्र में लंबी पारी खेलने की बात बार-बार करते हैं, लिहाजा उनकी सर्वोच्च प्राथमिकता यूपी ही है।
इस बार विधानसभा चुनाव की घोषणा के साथ ही प्रदेश में आरक्षित वर्ग के बड़े नेताओं ने भाजपा से पाला बदली की है। इनमें अधिकतर नेता सपा के खेमे में गए हैं। इस घटनाक्रम ने प्रदेश में जातीय राजनीति के दौर की वापसी का संकेत दिया है। भाजपा के लिए सबसे चुनौतीपूर्ण मसला यही है। यदि पार्टी ने पिछले लोकसभा और विधानसभा चुनावों की भांति जातीय वोटबैंक को प्रभावी नहीं होने दिया तो ठीक, वरना यूपी गंवाने के साथ ही उसके दिल्ली दरबार के भी दुर्दिन शुरू हो जाने हैं।

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