सबका बहुत कुछ दांव पर

— रतन मणि लाल —
उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव किसी अन्य राज्य के मुकाबले कहीं ज्यादा दूरगामी राजनीतिक प्रभाव डालने वाली प्रक्रिया है। न केवल 403 सदस्यों वाली विधानसभा में बहुमत पाना एक बहुत बड़ी उपलब्धि है, बल्कि यहाँ सरकार बनाने वाली पार्टी केंद्र में सरकार और आगे आने वाले लोकसभा चुनाव के लिए दिशा तय करती है। लंबे समय बाद भारतीय जनता पार्टी की सरकार उत्तर प्रदेश और केंद्र, दोनों जगह है। मगर इस समय पार्टी प्रदेश की सत्ता बनाए रखने की कठिन लड़ाई में कई मोर्चों पर लड़ रही है।
वर्ष 2017 में हुए विधानसभा चुनाव में भाजपा ने अप्रत्याशित बहुमत से जीत हासिल की थी और उससे भी ज्यादा अप्रत्याशित तरीके से योगी आदित्यनाथ प्रदेश के मुख्यमंत्री बने थे। अपने काम करने के तरीके और प्रखर हिंदुवाद का समर्थन करने वाले योगी के लिए आसन्न चुनाव में न केवल विपक्षी दलों की चुनौती है, बल्कि पार्टी छोड़ गए नेता, पार्टी के भीतर असंतोष, महंगाई, बेरोजगारी आदि कई मुद्दे भी जीत की राह में आड़े आ रहे हैं। जहां भाजपा ने उत्तर प्रदेश में 2014 का लोकसभा चुनाव, 2017 का विधान सभा चुनाव और फिर 2019 का लोकसभा चुनाव मोदी की लोकप्रियता और उनकी नीतियों पर विश्वास की वजह से भारी बहुमत से जीता था, वहीं ये माना जा रहा है कि 2022 का विधानसभा चुनाव मोदी ही नहीं, बल्कि योगी के शासनकाल पर लोगों की प्रतिक्रिया का संदेश होगा। यह एक बड़ी वजह है कि योगी इस चुनाव में अपने को मुख्यमंत्री बनाए जाने का अनुमोदन चाह रहे हैं, वहीं मोदी और भाजपा नेतृत्व योगी को मुख्यमंत्री बनाए जाने के निर्णय के औचित्य तलाश रहे हैं।
योगी के पहले प्रदेश में समाजवादी पार्टी की सरकार के मुखिया अखिलेश यादव थे, जो अपने कार्यकाल का अंत आते-आते अपने परिवार में टकराव और पार्टी में टूट का कारण बने। यह उनके चुनाव हारने का एक बड़ा कारण था। आज अखिलेश ने अपनी पार्टी पर पूरा नियंत्रण बना लिया है। पाँच साल पहले के घटनाक्रम के बाद अलग हुए उनके चाचा शिवपाल यादव अपनी अलग पार्टी बना कर विफल होने के बाद फिर अखिलेश की शरण में हैं। अन्य विपक्षी दलों में बहुजन समाज पार्टी केवल मायावती के ही नेता होने के कारण चुनाव में आगे नहीं बढ़ पा रही है। जहां तक काँग्रेस का सवाल है, तो उत्तर प्रदेश में एक मजबूत राज्य-स्तरीय नेतृत्व न होने के कारण यह पार्टी कुछ कदम आगे बढक़र कई कदम पीछे चली जा रही है।
ऐसे में, प्रदेश के छोटे दलों और बाहर से आए दलों की यहाँ के इतने बड़े चुनावी मैदान में अपने लिए भी जगह ढूँढऩे की कोशिश जारी है। इन कोशिशों में हर तरह के चुनावी वादे और दावे इस्तेमाल किये जा रहे हैं। इनमें जाति, धर्म, व्यक्तिगत आरोप, अशोभनीय भाषा, गलत आँकड़े आदि शामिल हैं। राजनीति के इन पहलुओं को जरा नजदीक से देखते हैं।

जाति बनेगी निर्णायक?
वर्ष 2014 से हुए तीन चुनावों के नतीजे देखने से स्पष्ट है कि मोदी की लोकप्रियता की वजह से इनमें प्रदेश की चुनावी राजनीति में जातियों का प्रभाव कम हुआ था। बहुसंख्यक वर्ग ने एकजुट होकर मोदी के पक्ष में वोट डाला था और कई दशकों में पहली बार जाति नहीं, बल्कि पार्टी के पक्ष में समर्थन दिखा। जहां भाजपा ने इसे मोदी की ‘सबका साथ, सबका विश्वास’ की नीति का समर्थन बताया, वहीं अन्य दलों ने आरोप लगाया कि केवल धर्म के आधार पर भाजपा के पक्ष में वोट डाला गया।
सच तो यही है कि पिछड़ी जातियों, अति पिछड़ी जातियों, दलित और कुछ अल्पसंख्यकों ने भाजपा का समर्थन इसलिए किया क्योंकि वे प्रदेश में तब तक बनी सरकारों की जातिवादी या संकीर्ण सोच से तंग आ चुके थे। मोदी ने उन्हें एक नई उम्मीद दिखाई थी, जिसका लोगों ने पूरा समर्थन किया। भाजपा ने भी पिछड़ी जातियों और दलितों को संगठन और सरकार में जगह देकर उनकी उम्मीदों को बनाए रखा।
उत्तर प्रदेश में वर्ष 2017 से चल रही भाजपा सरकार ने परोक्ष रूप से किसी जाति विशेष को प्रश्रय न देकर इस धारणा को मजबूत किया कि पिछली सपा और बसपा की सरकारों से अलग, यह सरकार समाज के एक या दो वर्गों के हित से आगे की भी सोचती है। ऐसा संभव है कि कुछ राजनीतिक नेताओं को इस वजह से अपनी जाति-आधारित राजनीति के लिए भविष्य का संकट नजर आया हो। ऐसा इसलिए भी लगता है क्योंकि किसी और दल को छोडक़र पाँच साल तक भाजपा में बने रहने और विधायक व मंत्री बने रहने के बाद भी करीब एक दर्जन नेताओं ने अचानक भाजपा छोडक़र सपा में शरण ले ली। लगभग इन सभी नेताओं ने पार्टी छोड़ते समय जो पत्र लिखे, उनकी भाषा एक जैसी थी। ऐसे में आरोप लगा कि वे सभी पत्र एक ही जगह, शायद एक ही व्यक्ति ने लिखे होंगे।
बसपा से भाजपा में आए और विधायक-मंत्री बने स्वामी प्रसाद मौर्य, धरम सिंह सैनी, दारा सिंह चौहान, विनय शाक्य और कई अन्य ने भाजपा में ‘पिछड़ों की उपेक्षा’ को कारण बता कर पार्टी छोड़ी। अब वे सपा से चुनाव लड़ रहे हैं।
इस घटनाक्रम से यह स्पष्ट है कि भाजपा के सभी जातियों को साथ लेकर, एक व्यापक बहुसंख्यक पहचान बनाने की पहल को सबका साथ नहीं मिल पा रहा है। यह जरूरी नहीं है कि हिन्दू होने के कारण एक ही पार्टी को समर्थन दिया जाए। जातियों के आधार पर अलग-अलग पार्टियों को भी समर्थन मिल रहा है। सपा को ओबीसी और मुस्लिम वर्ग का साथ मिलना और बसपा को दलित व मुस्लिम वर्ग का साथ मिलना, इसी का एक परिणाम लगता है। सपा ने पश्चिम में राष्ट्रीय लोक दल के साथ व अन्य क्षेत्रों में सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (एसबीसपी) और शिवपाल यादव की प्रगतिशील समाजवादी पार्टी (लोहिया) के साथ समझौता किया है।
अभी यह नहीं कहा जा सकता कि जन समर्थन के इस विकेन्द्रीकरण की वजह से चुनाव का नतीजा किसी एक दल के पक्ष या विरुद्ध जाएगा, लेकिन यह साफ है कि प्रदेश में जातियों का प्रभाव एक बार फिर अचानक बढ़ता दिखता है। कुछ पर्यवेक्षक इसे ‘मण्डल क्रांति’ की दूसरी लहर के रूप में देखते हैं।
नब्बे के दशक में मण्डल आयोग की सिफारिशें लागू होने के बाद देश में पिछड़ी जातियों का वर्चस्व बढ़ा था और बिहार, हरियाणा व कर्नाटक में तब मजबूत हुआ इन जातियों का राजनीतिक प्रभाव आज तक महसूस किया जा रहा है। उत्तर प्रदेश में 2017 में यह प्रभाव टूटा था और सपा-बसपा की बारी-बारी से सरकार बनाने का चक्र भी टूटा। लेकिन अब, 2022 में, राजनीति व समाज पर जातियों की पकड़ फिर से मजबूत होती दिख रही है।

प्रचार में मुद्दों की कमी
चुनाव प्रचार की शुरुआत में भाजपा द्वारा अपनी सरकार के दौरान किये गए काम, नई परियोजनाएं, केंद्र द्वारा सहयोग आदि विषयों पर बात की जा रही थी। लेकिन विपक्ष, विशेष तौर पर सपा द्वारा सरकार के काम के अलावा जाति और धर्म को भी मुद्दा बनाकर पिछड़ों की अवहेलना का आरोप लगाया। अब भाजपा द्वारा सीधे-सीधे सपा को निशाना बनाया जा रहा है। योगी ही नहीं, बल्कि पीएम नरेंद्र मोदी ने भी सपा और उसके कार्यकर्ताओं द्वारा पहनी गई लाल टोपी को भी चुनावी मुद्दा बना दिया है। सपा सरकार को ‘गुंडागर्दी’ का समर्थक, अपराध, कानून व्यवस्था में गिरावट और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में दंगों के लिए जिम्मेदार बताया जा रहा है। चुनावी आरोप-प्रत्यारोप अक्सर व्यक्तिगत स्तर तक आते दिख रहे हैं।
कुछ लोगों का मानना है कि चुनाव प्रचार को इस स्तर पर ले जाने के पीछे इन दोनों ही दलों में अपने समर्थन के प्रति अनिश्चितता हो सकती है। जहां कुछ हफ्ते पहले भाजपा में अपनी जीत के प्रति एक मजबूत विश्वास दिखता था, वहीं अब जीत के लिए कुछ भी कर जाने की मजबूरी नजर आ रही है।
सपा में भी यह भरोसा घर कर गया था कि लोग तो भाजपा सरकार से इतना नाराज हैं कि वे सपा और अखिलेश को समर्थन देंगे ही। लेकिन अब बड़ी बातें करने के बजाए मेहनत करने पर जोर दिखता है।
चुनाव प्रचार के बयानों और मुद्दों में महंगाई, बेरोजगारी, विकास के अलावा पाकिस्तान, जिन्ना, तालिबान, दंगाइयों की गर्मी उतार देना, बाहुबली और बजरंगबली जैसे बयान भी चर्चा का विषय बन रहे हैं।
अखिलेश और योगी द्वारा एक दूसरे पर नाम लेकर आरोप तथा मखौल उड़ाने की हद तक जुमलेबाजी की जा रही है। काँग्रेस के प्रचार में पहले तो प्रियंका वाड्रा के ‘लडक़ी हूँ, लड़ सकती हूँ’ के नारे पर और फिर 40 प्रतिशत टिकट महिलाओं को दिए जाने पर जोर दिया गया, लेकिन अब वहाँ भी आरोप लगाए जाने को मुद्दा बनाया जा रहा है। बसपा ने भी दलितों और पिछड़ों को नजरंदाज करने को ही बड़ा मुद्दा बनाया हुआ है। वहीं हैदराबाद से आए असदुद्दीन ओवैसी की एआईएमआईएम ने उत्तर प्रदेश की तीन छोटी पार्टियों से गठबंधन किया है और मुस्लिम, पिछड़ों व दलितों के ही मुद्दे पर राज्य की सभी सीटों पर चुनाव लडऩे की तैयारी है।
दिल्ली में सत्ता में बनी हुई आम आदमी पार्टी भी उत्तर प्रदेश की सभी सीटों पर चुनाव लडऩे को तैयार है और उसके मुद्दे भी अन्य विपक्षी दलों से अलग नहीं हैं। इनमें महंगाई, महिलाओं से बदसलूकी, सरकार द्वारा किये दावों का झूठ होना और वादे पूरे नहीं किये जाना शामिल हैं।

होगा धार्मिक ध्रुवीकरण?
ऐसा माना जाता है कि हिन्दू-मुस्लिम ध्रुवीकरण राजनीतिक दलों के लिए चुनावी फायदे का सौदा रहता है। 2013 के दंगे इसका बड़ा उदाहरण है। मगर उसके बाद से उत्तर प्रदेश में न कोई बड़ा हिन्दू-मुस्लिम टकराव हुआ है और न ही उसका कोई फायदा किसी दल को मिला है। लेकिन ऐसा होने का डर हमेशा बना रहता है। पुलिस के कुछ पूर्व अधिकारी कहते हैं कि चुनावी माहौल को बिगडऩे तथा इसे किसी एक दल के पक्ष में ले जाने की कोशिश में कोई दंगा हो जाने की संभावना अभी भी बनी हुई है।
प्रदेश सरकार के पाँच साल के कार्यकाल में राज्य में कोई भी बड़ा या छोटा दंगा नहीं हुआ है। ऐसे में जहां एक ओर वर्तमान सरकार चुनाव के पहले यही स्थिति बनाए रखना चाहेगी जिससे इसका श्रेय उसे मिले। वहीं दूसरी ओर दंगा हो जाने के फलस्वरूप हुआ ध्रुवीकरण किसी एक दल को फायदा भी पहुंचा सकता है।
भाजपा अपनी राज्य सरकार द्वारा किए विकास कार्यों के नाम पर वोट मांगने का दावा कर रही है, लेकिन धार्मिक प्रतीकों और नारों का इस्तेमाल भी खूब किया जा रहा है। समाजवादी पार्टी भी मुस्लिम मतदाताओं को अपने पक्ष में करने के लिए प्रतीकों और नारों का इस्तेमाल कर रही है। ओवैसी की पार्टी मुस्लिम मतों को लुभाने के लिए धार्मिक लाइन पर अपील कर रही है।
प्रचार के दौरान जिस तरह से जुमलेबाजी और अशोभनीय भाषा का प्रयोग किया जा रहा है, वह कभी-कभी डराता है। सोशल मीडिया पर पुराने विडियो, तोड़-मरोड़ कर बनाए गए बयान, पुरानी या नई घटनाओं के एक-पक्षीय विडियो आदि तेजी से वायरल हो रहे हैं। कुछ चैनल भी माहौल को गरम करने में लगे हुए हैं। हालांकि प्रदेश की पुलिस और अन्य विभाग अपने अपने स्तर पर रोक लगाने और अन्य कार्यवाई कर रहे हैं, लेकिन राजनीतिक फायदे के लिए कोई अनहोनी घटना हो जाना असंभव नहीं है।

ये संभावनाएं
उत्तर प्रदेश के चुनावी इतिहास में दो तथ्य अत्यंत रोचक हैं। पहला तो यह कि वर्ष 1989 से लेकर 2002 तक हुए चुनावों में किसी एक दल को बहुमत नहीं मिला, लेकिन 2007 में बसपा को स्पष्ट बहुमत मिला, जो प्रदेश के लोगों के एक पार्टी की स्थिर सरकार बनाने के इरादे का संकेत माना जा सकता है। वह सरकार पाँच साल तक चली। उसके बाद 2012 और 2017 में भी एक ही पार्टी को बहुमत मिला और स्थिर सरकारें बनी जो पाँच साल तक चलीं।
चुनावी इतिहास का दूसरा तथ्य है कि 1989 के बाद से किसी भी चुनाव में एक दल को दोबारा जीत नहीं मिली। तमाम कोशिशों के बावजूद सत्ता में रहे दल चुनाव जीत कर सरकार में बने रहने में सफल नहीं रह पाए थे। माना जाता है कि उत्तर प्रदेश के मतदाता अपनी सरकार से बहुत जल्द असन्तुष्ट हो जाते हैं और दूसरा मौका नहीं देते।
ऐसे में, भाजपा के सामने इन दो तथ्यों के विपरीत अपने को सिद्ध करने की बड़ी चुनौती है। वर्ष 2017 में भाजपा को बहुत भारी बहुमत मिला था। उस बहुमत को दोहराना किसी भी दल के लिए आसान नहीं है। योगी के लिए खुद जीत कर सरकार बनाना अपने लिए तो जरूरी है ही, नरेंद्र मोदी के लिए 2024 के लोकसभा चुनाव का मार्ग प्रशस्त करने के लिए भी जरूरी है। ऐसे में, योगी पर जिम्मेदारी कुछ ज्यादा ही है। चुनाव बाद योगी ही फिर मुख्यमंत्री बनाए जाएंगे ऐसा माना तो जाता है, लेकिन यदि भाजपा को सरकार बनाने में किसी और दल की सहायता लेनी पड़ गई तो उस दल की पसंद के अनुसार नेतृत्व बदलने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।
भाजपा के लिए 2017 की जीत दोहराना नहीं, बल्कि दोबारा सत्ता में आना ही उपलब्धि होगी। वहीं अखिलेश यादव के लिए यह चुनाव उनकी पार्टी और उनकी स्वयं के राजनीतिक भविष्य के लिए जरूरी है।
सपा की जीत पार्टी ही नहीं, बल्कि अखिलेश यादव के राजनीतिक भविष्य के लिए जरूरी है। पाँच साल तक सरकार चलाने के बाद विपक्ष में बैठना अखिलेश के लिए तनावपूर्ण अनुभव रहा है। उनकी पार्टी के नेता और कार्यकर्ता हर कुछ साल बाद सत्ता में रहने के आदी हैं। 2017 में पार्टी व परिवार में हुई टूट-फूट की यादें अभी ताजा हैं, जिनके लिए कई लोग अखिलेश को जिम्मेदार मानते हैं। यदि सपा सत्ता में नहीं आई तो अखिलेश, उनका परिवार और सपा तीनों पर संकट आ सकता है।

प्रियंका की साख दांव पर
काँग्रेस अपने पुनरोत्थान के लिए और प्रियंका वाड्रा खुद को काँग्रेस नेतृत्व की सीढ़ी पर ऊपर ले जाने के लिए चुनाव लड़ रही है। इस प्रक्रिया में पार्टी को जितनी भी सीटें मिल जाएं वह बढ़त ही है। पार्टी ने सपा के साथ अपरोक्ष रूप से समझौता किया हुआ है, जिसके अंतर्गत वह कई सीटों पर सपा के उम्मीदवार के खिलाफ अपना उम्मीदवार नहीं खड़ा कर रही है। अभी तक अखिलेश यादव और शिवपाल यादव के खिलाफ कांग्रेस प्रत्याशी न उतारने की घोषणा की जा चुकी है। हालांकि काँग्रेस कार्यकर्ताओं में नाराजगी है कि सपा की ओर से ऐसा कोई निर्णय नहीं लिया गया है। ऐसा माना जा रहा है कि यदि चुनाव बाद किसी तरह की परिस्थिति बनी तो काँग्रेस सपा को समर्थन देकर सरकार बनाने में मदद कर सकती है। इस आशय का बयान प्रियंका स्वयं भी दे चुकी हैं।

औपचारिक उपस्थिति
जहां तक बसपा का सवाल है, पार्टी के लिए मायावती का नेतृत्व बनाए रखने के अलावा कोई उद्देश्य नहीं है। दलित वर्ग के लिए मायावती सम्मान और आत्मविश्वास का प्रतीक हैं, चाहें वे सत्ता में हो या नहीं। बसपा जरूरत पडऩे पर संख्या बल में भाजपा को सहायता दे सकती है, ऐसा माना जाता है। हालांकि ऐसा होने पर उनके द्वारा सरकार में भागीदारी जैसी कोई बड़ी मांग की जाए तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए। ठ्ठ

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