राजस्थान में 50 नए जिलों की मांग

राजस्थान में विधायकों की चले तो कम से कम 23 जिलों का वे बंटवारा करवा दें। इन्होंने मिलकर प्रदेश में कुल 50 नए जिलों की मांग की है। राज्य का बजट 23 फरवरी को आने वाला है। बजट से पहले नए जिलों की मांग ने एक बार फिर जोर पकड़ा है। 23बड़े जिलों का बंटवारा कर 50 से ज्यादा जगहों से नए जिलों की मांग उठ रही है। खास बात ये है कि कांग्रेस और सहयोगी दलों के विधायक ही जिले बनाने के लिए ज्यादा जोर लगा रहे हैं। उनकी मांग से वोट बैंक भी जुड़ा है, इसलिए अंदरखाने लॉबिंग तेज हो गई है। राज्य में पिछले 14 साल में कोई नया जिला नहीं बना है।

अजमेर जिले से ब्यावर, बाड़मेर से बालोतरा, सीकर से नीमकाथाना, जोधपुर से फलोदी को जिला बनाने की मांग बहुत लंबे समय से उठती रही है। भाजपा राज में नए जिलों के लिए 2014 में बनी परमेश चंद कमेटी की रिपोर्ट के अनुसार 24 जिलों की 49 जगहों से नए जिले बनाने की मांग के प्रस्ताव और ज्ञापन आए थे। अब यह संख्या और बढ़ गई है। अब नागौर से पांच, जयपुर और गंगानगर से 4-4 जगहों से नए जिलों की मांग है। अजमेर, उदयपुर, अलवर, पाली, सीकर, भरतपुर से 3-3 जगहों से नए जिले बनाने की मांग उठ रही है।

प्रदेश में 2008 के बाद कोई नया जिला नहीं बना है। 26 जनवरी 2008 को भाजपा सरकार ने प्रतापगढ़ को जिला बनाया था। राजस्थान के जिले क्षेत्रफल के हिसाब से बहुत बड़े हैं। बाड़मेर, बीकानेर, जैसलमेर, नागौर जिलों में कई क्षेत्र ऐसे हैं, जहां से जिला मुख्यालय 150 किलोमीटर से भी ज्यादा दूरी पर होने से लोगों को तकलीफ होती है।पिछले दिनों कांग्रेस के चिंतन शिविर में प्रदेशाध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा की अगुवाई में सीकर के सभी विधायक मुख्यमंत्री से मिले थे। सभी ने सीकर को संभाग मुख्यालय और नीमकाथाना को जिला बनाने का प्रस्ताव मुख्यमंत्री को दिया था। विधायकों ने खुलकर अपने-अपने क्षेत्रों से उठ रही नए जिलों की मांग उठाई थी। खुले सत्र में विधायकों ने इस बार बजट में चार से पांच नए जिले बनाने का सुझाव दिया था।

पिछले 14 साल से नए जिलों के लिए कांग्रेस और भाजपा सरकारों ने अपनी-अपनी कमेटियां बनाईं। कमेटियों ने रिपोर्ट दे दी, लेकिन नए जिले बनाने पर दोनों सरकारों ने कोई फैसला नहीं किया। दोनों ही सरकारों पर नए जिले बनाने का काफी राजनीतिक दबाव भी था, लेकिन फैसला नहीं हो पाया। अब मौजूदा सरकार पर भी नए जिले बनाने का दबाव है। पिछले विधानसभा सत्र में तत्कालीन राजस्व मंत्री हरीश चौधरी ने भाजपा राज की कमेटी की रिपोर्ट मानने से इनकार कर दिया था।

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