दवाओं से दूषित होती नदियां

CLEANING THE GANGES

इंसानों द्वारा प्रयोग की गई दवाओं से दुनिया भर की नदियों का प्रदूषण स्तर बढ़ रहा है। ये हमारी पारिस्थितिकी व लोगों के स्वास्थ्य के लिए बहुत ही खतरनाक है। सभी महाद्वीपों के 104 देशों की 258 नदियों पर एक बड़ा वैज्ञानिक शोध किया गया था, जिसमें भारत की नदियों में दवा से जुड़े तत्वों का स्तर ज्यादा पाया गया। यह शोध दुनियाभर के 86 संस्थानों के 127 वैज्ञानिकों ने किया था। इंग्लैंड की यॉर्क यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं की नदियों में दवा प्रदूषण के स्तर का पता लगाने संबंधी शोध रिपोर्ट अमेरिका की प्रोसीडिंग्स ऑफ द नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेज ने प्रकाशित भी हुई है।

इन  दवाओं के अंश ज्यादा

शोधकर्ताओं ने नदियों के नमूनों का अध्ययन करने के लिए 104 देशों में 1052 साइट से पानी के नमूने एकत्र किये। इन नमूनों में 61 सक्रिय दवाओं के अंश (एपीआई) का परीक्षण किया। शोधकर्ताओं ने ये नमूने नदी के किनारे या शहरों, स्थानीय इलाकों आदि में बहने वाली नदी के पानी से इकट्ठा किए थे। रिपोर्ट के अनुसार नदियों के 19 फीसदी स्थानों पर एंटीबायोटिक का स्तर अधिक पाया है। इससे जीवाणुओं के रेजिस्टेंस की संभावना बढ़ गई है। एक स्थान पर एंटीबायोटिक की मौजूदगी खतरनाक स्तर तक पाई गई है। नदियों में सबसे ज्यादा मिर्गी रोधी दवा कार्बमेजपाइन पाई गई, क्योंकि ये दवा जल्दी टूटती नहीं है। इसके अलावा मधुमेह की दवा मेटफॉर्मिन और कैफीन की बड़ी मात्रा पाई गई। ये तीनों दवाएं आधे से अधिक शोध स्थानों पर मिली। ज्यादातर शोध स्थलों पर किसी न किसी एक दवा का कोई न कोई एक तत्व (एपीआई) मिला है।

दवा बनाने के लिए इस्तेमाल होने वाली सामग्री या तत्वों को एक्टिव फॉर्मास्युटिकल्स इनग्रेडिएंट्स (एपीआई) कहते हैं।

नदियों में फार्मास्यूटिकल के अवशेषों का पता लगाने तथा उन्हें मापने वाला यह पहला अध्ययन है। इस अध्ययन में कार्बामाजेपाइन, मेटफॉर्मिन और कैफीन जैसे 61 दवाओं की उपस्थिति को मापने के लिए नदियों के पानी का परीक्षण किया गया था। 36 देशों की नदियों पर पहले कभी भी फार्मास्युटिकल्स की जांच नहीं की गई थी। रिपोर्ट के अनुसार पाकिस्तान के लाहौर, बोलिविया के ला पाज और इथियोपिया के आदिस अबाबा में नदियों के जलस्तर में एपीआई का स्तर अधिक मिला है। इसी तरह ब्रिटेन, ग्लासगो, दलास और अमेरिका में ये स्तर 20 फीसदी है। स्पेन का मैड्रिड शहर शीर्ष 10 स्थानों में शामिल है, जहां नदी में सभी तरह की दवाओं के एपीआई का मिश्रण सबसे अधिक पाया गया है। शोध के अनुसार आइसलैंड और वेनेजुएला में दो गांव हैं, जो कि आधुनिक दवाओं का उपयोग नहीं करते हैं। वहां नमूनों में कुल सक्रिय दवाओं के अंश या फार्मास्यूटिकल इनग्रेडिएंट्स (एपीआई) की औसत सांद्रता शून्य पाई गई है। यानी वहां की नदियां दवाओं से प्रदूषित नहीं हैं। जबकि लंदन में नदियों में दवाओं की मात्रा 3,080 नैनोग्राम प्रति लीटर, दिल्ली में 46,700 और लाहौर में सबसे अधिक 70,700 तक पाई गई है।   

कचरा, अपशिष्ट से प्रदूषण

दरअसल इंसानों द्वारा प्रयोग की गई दवाएं गंदगी के रूप में सीधे सीवर के जरिए वातावरण में मिल रही हैं। दवा कंपनियों में दवाओं के निर्माण के दौरान निकलने वाले तत्व भी सीधे तौर पर नदियों के पानी में मिल जाते हैं। यही कारण है कि दुनिया भर की नदियों के पानी में दवाओं से जुड़े तत्वों का स्तर बढ़ता जा रहा है। नदियों में दवाओं का ये प्रदूषण दवा निर्माण संयंत्रों से निकलने वाले दूषित जल, बिना उपचार के सीवेज के पानी, शुष्क जलवायु, नदी के किनारे कचरा जमा करने या डंपिंग करने, अपशिष्ट निपटान की बुनियादी सुविधाओं का अभाव होने के कारण और अवशिष्ट सेप्टिक टैंक के कचरे को नदियों में डालने से पैदा हो रहा है। असल में इन देशों में दूषित जल और उद्योग से निकले प्रदूषित जल के निपटान का कानून तो बना हुआ है, लेकिन उन पर सही रूप से अमल नहीं हो पाता। यही कारण है कि नदियां अत्यधिक प्रदूषित होती जा रही हैं। सरकारों को इस पर सख्ती से काम करना चाहिए, कानूनों को कड़ाई से लागू करना चाहिए, तभी नदियों को प्रदूषण से बचाया जा सकेगा। जिन इलाकों में सीमित मानव जनित प्रभाव है, वहां आधुनिक दवाओं का इस्तेमाल कम होता है। जहां अत्याधुनिक दूषित जल उपचार ढांचा है और नदियों में पर्याप्त बहाव है, वहां की नदियों में दवाओं का अंश कम पाया गया है।

दवा से होने वाला प्रदूषण वन्यजीवों के लिए सबसे बड़ा खतरा है। इससे मछलियों के साथ-साथ दूसरे जलीय जीवों के लिए भी खतरा बढ़ता जा रहा है। वैज्ञानिकों का मानना है कि नदियों में दवाओं के कारण बढ़ रहा प्रदूषण करोड़ों लोगों के जीवन को प्रभावित कर सकता है। दवा उद्योग एक ओर जहां गंभीर बीमारियों में इलाज के लिए इंसानों को दवाएं उपलब्ध कराता है, वहीं दूसरी ओर ये इंसानों और पर्यावरण दोनों के लिए वैश्विक खतरा भी बनता जा रहा है। वैज्ञानिकों ने सुझाव दिया है कि सुरक्षित भविष्य के लिए एंटीबायोटिक समेत अन्य दवाओं का इस्तेमाल बहुत संभलकर करने की आवश्यकता है। खासकर वहां, जहां बिना डॉक्टरी सलाह के दवाएं बेची जाती हैं।

गरीबी, बेरोजगारी से जुड़ी समस्या

नदियों में दवाओं का प्रदूषण लगभग हर महाद्वीप के पानी में पाया गया है। किसी देश की सामाजिक-आर्थिक स्थिति और उसकी नदियों में दवाओं के अधिक मात्रा में प्रदूषण के बीच सीधा संबंध है। निम्न-मध्यम आय वाले देशों की नदियां इससे सबसे अधिक प्रदूषित पाई गई हैं। दवाओं के प्रदूषण का उच्चस्तर अधिक औसत आयु के क्षेत्रों के साथ-साथ उच्च स्थानीय बेरोजगारी और गरीबी दर के साथ भी जुड़ा पाया गया है। दुनिया के सबसे प्रदूषित देश और क्षेत्र वे हैं, जहां सबसे कम शोध किए गए हैं। जैसे- उप-सहारा अफ्रीका, दक्षिण अमेरिका और दक्षिण एशिया के कुछ हिस्से इस बात के उदाहरण हैं।

अध्ययन में उच्च आय वाले देशों या सबसे गरीब देशों की तुलना में निम्न-मध्यम आय वाले देशों में अधिकतम दवाओं की (एपीआई) सांद्रता पाई गई है। अध्ययनकर्ताओं का मानना है कि ऐसा शायद इसलिए है, क्योंकि निम्न और मध्यम आय वाले देशों में अपशिष्ट जल के उपचार के बुनियादी ढांचे सीमित हैं। मगर कम आय वाले देशों की आबादी की तुलना में, उनकी आबादी के पास दवाओं तक पहुंच अधिक है। हालांकि कम आय वाले देशों में भी अपशिष्ट जल उपचार की सुविधाएं अच्छी नहीं हैं, लेकिन दवाओं तक कम पहुंच और उनको खरीदने की क्षमता नदियों में सांद्रता के कम होने का कारण हो सकती हैं।

शोध में भारत के नमूनों में कैफीन और निकोटीन जैसे उत्तेजक दवाओं के अलावा एनाल्जेसिक एंटीबायोटिक्स, एंटी-कॉन्वेलसेंट्स, एंटी-डिप्रेसेंट्स, एंटी-डायबिटिक, एंटी-एलर्जी दवाएं और बीटा ब्लॉकर्स नामक कार्डियोवैस्कुलर दवाएं पाई गई हैं। हालांकि इस तरह के प्रदूषण से इंसानों को होने वाले नुकसान का अभी तक कोई प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं मिला है, लेकिन वैज्ञानिकों को चिंता है कि अगर खाने के लिए उपयोग में लिए गए जलीय जीवों के शरीर में मौजूद दवा की मात्रा आवश्यक चिकित्सीय सांद्रता के स्तर तक पहुंच जाती है, तो इससे इंसानों पर प्रभाव पड़ सकता है। पर्यावरण में एंटीबायोटिक दवाओं के उच्च स्तर भी रोगाणुओं में दवा प्रतिरोध की क्षमता बढ़ा देते हैं। दुनिया भर में 64 जगहों पर सिप्रोफ्लोक्सासिन सुरक्षित सीमा से अधिक पाई गई है। भारत में 21,000 नैनोग्राम प्रति लीटर में मधुमेह उपचार की दवा, दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी मात्रा में पाई गई है। शोधकर्ताओं ने बताया है कि नमूने वाली एक चौथाई जगहों पर कम से कम एक दवा का अंश पाया गया है, जो जलीय जीवों के लिए सुरक्षित माने जाने वाले स्तर से अधिक है। 

– रं.मि.

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