कांग्रेस : थम नहीं रहा बुरा दौर

कांग्रेस का बुरा दौर थमने का नाम ही नहीं ले रहा है। पार्टी अपना खोया जनाधार वापस पाने का प्रयास तो लगातार कर रही है, लेकिन कमजोर नेतृत्व और ओल्ड गार्ड्स का स्वार्थी नजरिया उसके अथक प्रयासों पर पानी फेर रहा है। करीब आठ साल से ऐसा ही चल रहा है। 2014 में शुरू हुआ बुरा दौर अभी भी जारी है।

चुनाव में फिर दुर्गति
हाल ही में सम्पन्न पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में भी कांग्रेस की खूब दुर्गति हुई। देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में स्वयं गांधी परिवार की सदस्य और कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी थी। फिर भी कांग्रेस की सीटें घटने के साथ-साथ मत प्रतिशत भी लुढक़ गया। पार्टी के प्रदेशाध्यक्ष अजय कुमार लल्लू तक भारी मतों से हार गए।
पांच चुनावी राज्यों में से जिस एकमात्र राज्य-पंजाब में कांग्रेस की सरकार थी, वहां भी उसके नेताओं के बीच की कलह उसे ले डूबी है। प्रदेश के मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी दो विधानसभा सीटों से चुनाव लड़े औऱ दोनों ही जगह हार गए। बड़बोले पंजाब कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष नवजोत सिंह सिद्धू अपने गढ़ अमृतसर में धाराशायी हो गए। उन्होंने हार स्वीकार करने की औपचारकता निभाई और कहा, जनता की आवाज, भगवान की आवाज है। पंजाब के लोगों का जनादेश विनम्रतापूर्वक स्वीकार करता हूं, ‘आप’ को बधाई।
बाकी चुनावी राज्यों-गोवा, मणिपुर और उत्तराखंड में भी कांग्रेस का बुरा हाल रहा। उत्तराखंड में तो मुख्यमंत्री पद के दावेदार और पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत भी चुनाव हार गए। उन्होंने खुद की हार स्वीकारते हुए पार्टी की पराजय की भी जिम्मेदारी ओढ़ ली। कहने लगे, शायद हमारे प्रयासों में कुछ कमी रह गई जो हम उत्तराखंड के लोगों का विश्वास नहीं जीत सके। हम निश्चिंत थे कि लोग बदलाव के लिए वोट करेंगे, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। मैं ये स्वीकार करता हूं और इस हार की जिम्मेदारी लेता हूं। उन्होंने भाजपा की जीत पर आश्चर्य भी जताया और कहा, मेरे लिए यह नतीजे बेहद चौंकाने वाले हैं। मैं समझ नहीं पा रहा कि इतनी अधिक महंगाई के बावजूद अगर लोगों का यह जनादेश है तो लोक कल्याण और सामाजिक न्याय की परिभाषा क्या है? इसके बाद लोगों का भाजपा जिंदाबाद कहना मेरी समझ से परे है।
इसी प्रकार गोवा की हार को लेकर वरिष्ठ कांग्रेस नेता पी. चिदंबरम ने भारी मन से दो शब्द कहे, हम गोवा के लोगों का फैसला स्वीकार करते हैं। कई बाधाओं के बावजूद हमारे उम्मीदवार बहादुरी से लड़े। लोगों ने भाजपा को सत्ता सौंपी है। हम इसे स्वीकार करते हैं। कई विधानसभा क्षेत्रों में हम बहुत ही कम अंतर से हारे हैं। विभिन्न दलों के बीच वोटों के बंटवारे के चलते हमारा संख्या बल उम्मीदों से कम रहा। भाजपा को 33 फीसदी से कुछ ही ज्यादा वोट मिले हैं, बाकी वोट बंट गए।

हर बार एक सा बयान
साल दर साल कांग्रेस के साथ पराजय की कहानी दोहराई जा रही है। हार के बाद पार्टी नेताओं के बयान भी लगभग समान ही होते हैं। वे हर बार हार स्वीकार करने और इससे सबक लेने की बात कहते हैं। पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी तो 11 बार हार स्वीकारने तथा सबक लेने की बात कर चुके हैं।
वर्तमान हार पर भी राहुल गांधी ने पुरानी स्क्रिप्ट को दोहराया कि विनम्रतापूर्वक जनता का फैसला स्वीकार करते हैं, इससे सबक लेंगे। उन्होंने कहा, जनता के फैसले को विनम्रतापूर्वक स्वीकार करते हैं। जनादेश जीतने वालों को शुभकामनाएं। मैं सभी कांग्रेस कार्यकर्ताओं और स्वयंसेवकों को उनकी कड़ी मेहनत और समर्पण के लिए धन्यवाद देता हूं। हम इससे सीखेंगे और भारत के लोगों के हित के लिए काम करते रहेंगे।
वहीं, प्रियंका गांधी ने ट्वीट के जरिये घिसेपिटे वाक्यों को दोहराया। उन्होंने कहा, लोकतंत्र में जनता का मत सर्वोपरि है। हमारे कार्यकर्ताओं और नेताओं ने मेहनत की, संगठन बनाया, जनता के मुद्दों पर संघर्ष किया, लेकिन हम अपनी मेहनत को वोट में तब्दील करने में कामयाब नहीं हुए। कांग्रेस पार्टी सकारात्मक एजेंडे पर चलकर उत्तर प्रदेश की बेहतरी व जनता की भलाई के लिए संघर्षशील विपक्ष का कर्तव्य पूरी जिम्मेदारी के साथ निभाती रहेगी।
कांग्रेस के मुख्य प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला ने भी पार्टी लाइन पकड़े हुए कहा, इस जनादेश से सबक लेकर आत्मचिंतन करेंगे। इस हार पर आत्मचिंतन करने के लिए जल्द ही कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक बुलाई जाएगी और पार्टी नए बदलाव एवं रणनीति के साथ सामने आएगी। इस बीच, दिल्ली में कांग्रेस मुख्यालय के बाहर पार्टी कार्यकर्ताओं ने ईवीएम के खिलाफ प्रदर्शन किया और पोस्टर बैनर लेकर पार्टी की असफलता को ईवीएम की खामी बताया।
चुनावी हार झेलना और उसपर अफसोस करना कांग्रेस की नीयति बन गई लगती है। ताज्जुब इस बात का है कि आखिर पार्टी समय की मांग के अनुरूप खुद में बदलाव क्यों नहीं लाती है। वही गांधी परिवार और उनके करीबी ओल्ड गार्ड्स जहां देखो वहां कांग्रेस विचारधारा की बात करते रहते हैं। नई सोच, नई ऊर्जा, नए चेहरों का टोटा सा पड़ गया है पार्टी में। जाहिर है, तब युवा मतदाताओं का बड़ा वर्ग इसकी ओर कैसे आकर्षित होगा?

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