90% लोग बिना डायबिटिज के ले रहे दवा !

90 प्रतिशत लोग बिना डायबिटीज बीमारी के ही दवा ले रहे हैं। इसका कारण, बिगड़ती लाइफ स्टाइल के साथ अधूरे टेस्ट हैं। यह दावा साइंटिस्ट, डायबिटीज रिसर्चर डॉ एस. कुमार ने किया है।

डॉ. कुमार ने दावा किया है कि डायबिटीज के मरीज 369 दिनों का एक प्रोटोकॉल अपनाकर पूरी तरह ठीक हो सकते हैं। उन्होंने कहा कि अभी केवल बेसिक 3 जांचों के आधार पर ब्लड में ग्लूकोज का स्तर बढ़ा हुआ मान लिया जाता है। इस आधार पर ही मरीज को डायबिटिक मानकर इलाज शुरू किया जाता है। फिर उसे जिंदगी भर दवाईयां लेनी पड़ती है। उन्होंने बताया कि वह फार्मा फील्ड के साथ बीमारी पर कर चुके रिसर्च की वजह से ऐसा दावा कर रहे हैं। अब उन्होंने डायबिटीज की सही जांच के लिए ‘डाइबोप्लास्टी प्रोटोकॉल 369’ पद्धति से इलाज की मुहिम शुरू की है। डॉ. एस कुमार का दावा है कि इसी रिसर्च के बाद से 50 हजार से ज्यादा मरीज की डायबिटीज पूरी तरह ठीक कर चुके हैं।

दुनियाभर में डायबिटीज मरीजों की सबसे ज्यादा संख्या भारत में है। डायबिटीज पीड़ित हर 5वां व्यक्ति भारतीय है। वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन के अनुसार दुनिया में 44.2 करोड़ डायबिटीज मरीज हैं। भारत में अभी 7.2 करोड़ लोग इससे पीड़ित हैं, जबकि 2030 में डायबिटीज मरीज की संख्या 8 करोड़ को पार कर जाएगी। इसमें चौंकाने वाली बात यह है कि 3.6 करोड़ से ज्यादा लोगों को डायबिटीज का पता ही नहीं चल पाता है।

हालांकि डॉ. एस कुमार इसे अधूरा सच मानते हैं। क्योंकि देश में डायबिटीज मरीजों की यह वास्तविक संख्या नहीं है। उनके अनुसार भारत में ज्यादातर लोगों को डायबिटीज है ही नहीं। केवल लक्षण के आधार पर ही उन्हें डायबिटीक मानकर इलाज किया जा रहा है। कई दूसरी बीमारियों के कारण, दवाओं और स्टेरॉयड के नेगेटिव इफेक्ट्स या बिगड़ी हुई लाइफ स्टाइल के कारण डायबिटीज के लक्षण सामने आ सकते हैं। ऐसे में इन कारणों को जानकर इस बीमारी को सही किया जा सकता है।

डॉ. एस कुमार ने बताया कि आम तौर पर डायबिटीज की जांच के लिए भारत में मरीजों के 3 तरह के ही टेस्ट चलन में हैं। जबकि मेडिकल और फार्मा बुक्स में कई दूसरे टेस्ट और कारणों की जांच भी लिखी हुई हैं। अभी ब्लड ग्लूकोज फास्टिंग, रैंडम और एचबीए1सी टेस्ट ही किए जाते हैं। लेकिन ‘डाइबोप्लास्टी प्रोटोकॉल 369’ पद्धति के तहत इन तीनों टेस्ट के अलावा फास्टिंग सीरम इन्सुलिन, सी-पेप्टाइड, होमा-आईआर टेस्ट भी करवाए जाते हैं। इन टेस्ट के जरिए यह देखा जाता है कि शरीर में बीटा सेल्स कोशिका बराबर काम कर रही हैं या नहीं।

एंजियोप्लास्टी की तरह डाइबोप्लास्टी प्रोटोकॉल अपना कर उन सेल्स पर वर्क किया जाता है, जो काम नहीं कर पा रही हैं। उन्होंने बताया ज्यादातर डॉक्टर लक्षण पर काम करते हैं, जबकि डॉ. कुमार उपयुक्त सिस्टम और कारणों पर काम करके इलाज करते हैं। मरीजों को कुछ सप्लिमेंट भी दिए जाते हैं। इनके जरिए बीमारी की जड़ तक पहुंचकर इलाज किया जाता है। इससे बॉडी में इन्सुलिन फिर से पर्याप्त मात्रा में बनने लग जाता है। डॉ. एस कुमार को भारत गौरव अवॉर्ड के लिए चुना गया है। इससे पहले देश की पूर्व राष्ट्रपति प्रतिभा देवी पाटिल भी उनका सम्मान कर चुकी हैं।                (साभार—भास्कर)

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