दोषियों की रिहाई का मसला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा

बहुचर्चित बिलकिस बानो गैंगरेप केस के 11 दोषियों की समयपूर्व रिहाई के खिलाफ करीब 6000 लोगों ने सु्प्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। इन लोगों ने गुजरात सरकार के फैसले की आलोचना करते हुए दोषियों की रिहाई के फैसले को रद्द करने की मांग की है।

गुजरात सरकार की क्षमा नीति के तहत बिलकिस बानो गैंगरेप केस के सभी 11 दोषियों को 15 अगस्त को जेल से रिहा कर दिया गया है। दोषियों की रिहाई के बाद से सरकार का फैसला विवादों में है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता राहुल गांधी, प्रियंका गांधी तथा अन्य दलों के नेताओं ने इस फैसले की आलोचना की है। अब गुजरात सरकार के इस फैसले के खिलाफ करीब 6000 सामाजिक कार्यकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है।

जानकारी के अनुसार मानवाधिकार कार्यकर्ता, इतिहासकार, नौकरशाह तथा अन्य प्रतिष्ठित हस्तियों ने सुप्रीम कोर्ट से बिलकिस बानो मामले में दोषियों की रिहाई को रद्द करने का आग्रह किया है। इन लोगों ने रिहाई के फैसले को ‘न्याय का गंभीर गर्भपात’ बताते हुए गुजरात सरकार के निर्णय को रद्द करने की मांग की है। इस सभी ने एक बयान में कहा कि यह शर्म की बात है कि जिस दिन हमें अपनी आजादी का जश्न मनाना चाहिए और आजादी पर गर्व होना चाहिए, उसी दिन सामूहिक बलात्कारियों और सामूहिक हत्यारों को रिहा किया गया। 2002 के गोधरा कांड में बिलकिस बानो के साथ हुए सामूहिक बलात्कार करने और उनके परिवार के सात लोगों की निर्मम हत्या करने वाले 11 दोषियों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई थी।

किंतु 15 अगस्त को गुजरात सरकार की क्षमा नीति के तहत इन सभी को जेल से रिहा कर दिया गया। दोषियों की रिहाई के बाद बिलकिस बानो ने कहा था कि यह फैसला न्याय के भरोसे को तोड़ने वाला है। उनके पति ने दोषियों की रिहाई के बाद परिवार पर जान का खतरा होने की बात कही थी।

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