सत्रावसान पर राज्यपाल ने गहलोत सरकार को घेरा

अखिल भारतीय पीठासीन अधिकारी सम्मेलन में बुधवार को जहां उपराष्ट्रपति, लोकसभा अध्यक्ष, मुख्यमंत्री आदि न्यायपालिका पर नाराजगी जताते रहे, वहीं गुरूवार को राजस्थान के राज्यपाल कलराज मिश्र ने प्रदेश की कांग्रेस सरकार पर परोक्ष निशाना साधा। उन्होंने कहा, विधानसभा का सत्र आहूत करने का काम राज्य सरकार की सिफारिश पर राज्यपाल अपनी शक्ति से करता हैं, लेकिन मैनें ये महसूस किया है कि सत्र आहूत करने के बाद सत्रावसान नहीं किया जाता है। सत्रावसान नहीं करके सत्र की बैठकें बुलाने की परिपाटी बन रही हैं, ये लोकतांत्रिक संस्थाओं के लिए घातक है।

सम्मेलन को संबोधित करते हुए राज्यपाल ने कहा कि सत्रावसान नहीं करने से सदस्यों के सवाल पूछने के अधिकारों का हनन होता हैं। सदस्यों को सवाल पूछने की सीमा में बंध जाना पड़ता है। संवैधानिक परम्पराएं पूरी नहीं हो पाती हैं। सत्र आहूत हो और इसका सत्रावसान करने पर गंभीरता से ध्यान देने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि आज सदन की बैठकें कम होती हैं इससे बढ़ाने की जरूरत है। जनहित के मामलों पर चर्चा नहीं हो पाती है। यदि सरकार के पास बिजनेस नहीं हों तो जन समस्याओं पर चर्चा की जानी चाहिए। इसके साथ ही प्राइवेट बिल भी लाने चाहिए। विधायी काम यदि जल्दबाजी में निपटाएंगे तो जो कानून बनेंगे वो प्रभावी नहीं होंगे। आनन फानन में बिल पास करना चिंतनीय और लोकतंत्र के लिए ठीक नहीं है।

सत्रावसान न किए जाने की चर्चा छेड़कर राज्यपाल मिश्र ने कांग्रेस सरकार को घेरने की कोशिश की। प्रदेश की गहलोत सरकार में साल 2020 जुलाई के बाद विधानसभा सत्र का सत्रावसान नहीं किया जा रहा था। सदन की बैठक स्थगित करके कुछ माह बाद सदन आहूत करने की बजाय सदन की निरंतर बैठक बुला ली जातीं। पिछले साल भी ऐसा किया गया था। इस बार जरूर बजट सत्र शुरू करने से पहले पिछले सत्र का सत्रावसान कर नए सिरे से सत्र आहूत किया गया है।

राजस्थान में सत्रावसान नहीं करने के पीछे वजह थी सचिन पायलट की बगावत। उस समय सीएम गहलोत ने सदन को आहूत करने की सिफारिश भेजी थी, लेकिन सत्र बुलाने से पहले कई बार फाइल मंजूर नहीं हुई। इसके बाद कांग्रेस सरकार के मंत्रियों और विधायकों ने राजभवन की ओर कूच करके धरना दिया था। इसके बाद सदन का सत्रावसान करने की परंपरा कम कर दी गई।

राज्यपाल कलराज मिश्र ने ये भी कहा कि विधानसभा से पारित बिल तब तक अधिनियम नहीं बन पाता हैं, जब तक राज्यपाल इस पर हस्ताक्षर नहीं कर देता। बहुत बार ये आरोप लगता हैं कि राजभवन जानबूझकर इसमें देरी कर रहा है, लेकिन इसके कई और पहलू है। इसमें जनहित सबसे आगे रखा जाता है और देखा जाता हैं किे जनता का बिल से कितना फायदा होगा। सदन जनता के मंदिर है। यहां पर कानून बनते है। जनप्रतिनिधि जनहित के मामलों पर बहस करें। जो भी बिजनेस हो, वह जनकल्याणकारी होना चाहिए।

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