बरस बीता, वक्त नहीं

– अनिल चतुर्वेदी –

चल हट 2020….ये झिडक़ी इस महीने एफएम रेडियो पर खूब सुनने को मिली। दुनियाभर में साल 2020 को लेकर लोगों में नाराजगी, नफरत साफ देखी जा रही है। अब इसकी बिदाई हो रही है तो आने वाला साल खुशियों से भरा होने की कामना हरकोई कर रहा है।

साल 2020 ने ऐसे तेवर दिखाएं हैं कि लोग तौबा कर बैठे। मार्च बीतते-बीतते घरबंदी हो गई। उसके बाद तो दोस्त, दोस्त ना रहा….प्यार,प्यार ना रहा। पड़ोसी तक गैर हो गए तो शंकालु निगाहें हर किसी पर पडऩे लगीं। घर की कैद चुभने लगी तब अवसाद ने डेरा जमा लिया। करोड़ों मजदूरों का पश्चिम से पूरब की ओर पलायन, फिर कोरोना से अपनों की मौत ने सभी को हिला कर रख दिया। ऐसे-ऐसों की रोजी-रोटी छिन गई, जिन्होंने सपने में भी खाने के लाले पड़ जाने के बारे में सोचा नहीं था।

हालांकि इस साल ने जाते-जाते हालात थोड़े सुधारे जरूर हैं, लेकिन दुर्दिनों का खौफ लोग भूल नहीं पा रहे हैं। तभी तो कोरोना उपचार की वैक्सीन तैयार होने, ट्रायल होने और अब इसकी बिक्री शुरू होने तथा लगाए जाने का बेसब्री से इंतजार किया जा रहा है। वैक्सीन के साइड-इफैक्ट को लेकर ज्यादा सोच-विचार नहीं किया जा रहा है। बस, किसी भी तरह कोरोना की आफत से छुटकारा मिले, यही सबके दिमाग में चल रहा है।

इस हद तक की घबराहट पैदा करने वाले साल 2020 को भला कौन भावभीनी बिदाई देना चाहेगा? अब नए साल 2021 से उम्मीद की जा रही है कि उसमें खुशी और वैक्सीन की डबल डोज मिले। ताकि 2021 में, पिछले साल की ‘’ना-खर्च’’ खुशियों की भरपाई और नए साल की खुशियों के मजे साथ-साथ ले सकें। ये तो हुई जनता-जनार्दन के मन की बात। मगर मन के साथ अक्ल की डोज लेना भी जरूरी है। साल 2020 बहुत कुछ सबक सिखाकर जा रहा है। हमारी गलत आदतों पर भी इसने गहरी चोट की है। अच्छा हो, आगे हम इस सबक पर अमल की मलहम से चोट भरने का प्रयास करें।

इस काम में हमें खुद के विवेक का ही इस्तेमाल करना होगा। किसी के कथित ज्ञान पर गौर करने का समय अब नहीं रहा। क्योंकि इस साल का एक अफसोसजनक पहलू भी है। वो है, मीडिया से सच का गायब हो जाना। आप ज्यादातर मीडिया पर भरोसा नहीं कर सकते कि वो सच ही बोल रहा है। अपने-अपने नजरिये से सब सच के नाम पर झूठ का रस पिला रहे हैं। ये रस हमें पूरी तरह अज्ञानी बनाए, इससे पहले अपने विवेक को जगा लें और जुट जाएं साल 2020 के घावों को भरने में। प्रस्तुत अंक  में इस साल (2020) के तीखे तेवर पर ही फोकस किया गया है। तेवर की पीड़ा और इससे मिली सीख हमारी जीवनयात्रा के आगे के सफर को प्रभावित करेगी। यही ध्यान में रखते हुए बुरे दौर पर भड़ास निकाली गई है, ताकि फिर शांतचित्त होकर आगे सुखमय राह निकालने की कोशिश हो।

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