शुरू से है विवाद

– रंजना मिश्रा

रूस और यूक्रेन के बीच तनाव महीनों से नहीं, बल्कि वर्षों से चला आ रहा है। अब इसकी परिणति युद्ध के रूप में हुई है। हमें देखना होगा कि दोनों देशों के बीच विवाद की जड़ आखिर है क्या?

दरअसल रूस और यूक्रेन के बीच तनाव 1991 में ही शुरू हो गया था, जब यूके्रन सोवियत संघ से अलग हुआ था। दोनों देशों के बीच क्रीमिया को लेकर कई बार टकराव की स्थिति बनी और नवंबर 2013 में इसने गंभीर रूप ले लिया। रूस समर्थित यूक्रेन के तत्कालीन राष्ट्रपति विक्टर यानुकोविच का कीव में विरोध शुरू हो गया। यानुकोविच का विरोध अमेरिका-ब्रिटेन समर्थित प्रदर्शनकारी कर रहे थे, जिसके कारण उन्हें फरवरी 2014 में देश छोडक़र भागना पड़ा। इससे नाराज रूस ने दक्षिणी यूके्रन के क्रीमिया शहर पर न सिर्फ कब्जा किया, बल्कि वहां के अलगाववादियों को समर्थन भी देने लगा। इन अलगाववादियों ने पूर्वी यूक्रेन के बड़े हिस्से पर कब्जा कर लिया। 2014 के बाद से रूस समर्थक अलगाववादियों और यूक्रेन की सेना के बीच डोनबास प्रांत में संघर्ष चलता रहा है। रूस और यूक्रेन के तनाव व टकराव को रोकने के लिए पश्चिमी देशों ने पहल की। 2015 में फ्रांस और जर्मनी ने बेलारूस की राजधानी मिन्स्क में दोनों के बीच शांति समझौता कराया, मगर शांति हो न सकी। दोनों देश लगातार संघर्षरत रहे।

नाटो पर बढ़ा तनाव

रूस और यूक्रेन के बीच हाल के विवाद का कारण नाटो का विस्तार और यूरोपीय देशों के साथ रूस के बदलते संबंध हैं, जो पिछले 30 सालों में बनी जटिल परिस्थितियों का परिणाम हैं। अब रूस-यूक्रेन युद्ध को तीसरे विश्वयुद्ध की आहट माना जा रहा है। रूस ने यूक्रेन के मित्र देशों को धमकी दी है, तो अमेरिका ने भी रूस को भयंकर परिणाम भुगतने की चेतावनी दे डाली है। असल में यूक्रेन नाटो में शामिल होना चाहता है, लेकिन रूस नहीं चाहता कि यूक्रेन ऐसा करे।

बताते चलें कि वर्ष 1939-1945 के बीच चले दूसरे विश्वयुद्ध के समाप्त होने के बाद सोवियत संघ की विस्तारवादी नीति कायम रही, जिसे रोकने के लिए वर्ष 1949 में अमेरिका, कनाडा, फ्रांस, ब्रिटेन और 8 अन्य यूरोपीय देशों ने मिलकर एक सैन्य गठबंधन किया था। इस सैन्य गठबंधन को ही नाटो (नॉर्थ अटलांटिक ट्रीटी ऑर्गेनाइजेशन) कहा जाता है। धीरे-धीरे इसके सदस्य बढ़ते गए। वर्तमान में 30 देश नाटो के मेंबर हैं। इसका उद्देश्य साझा सुरक्षा नीति पर काम करना है। अगर कोई देश नाटो के किसी भी सदस्य पर हमला करता है, तो नाटो में शामिल सभी देश एकजुट होकर उसका मुकाबला करते हैं।

दूसरा विश्व युद्ध खत्म होने के बाद दुनिया में सोवियत संघ और अमेरिका दो सुपर पावर उभरे। 25 दिसंबर 1991 को सोवियत संघ टूटा और 15 नए देश बन गए। इनमें से अधिकतर देश नाटो में शामिल हो गए। 2008 में जॉर्जिया और यूक्रेन को भी नाटो में शामिल होने का न्यौता दिया गया था, लेकिन रूस ने ऐसा नहीं होने दिया। रूस के राष्ट्रपति नाटो के विस्तार को लेकर लगातार आपत्ति जताते रहे हैं। क्योंकि रूस नहीं चाहता कि नाटो पूर्वी यूरोप में अपना विस्तार करे। रूस को चिंता यह है कि अगर यूक्रेन भी नाटो का सदस्य बन जाता है तो रूस नाटो से घिर जाएगा। यानी दुश्मन ताकतें उसके घर के करीब आ जाएंगी। तब अमेरिका जैसे देश उस पर हावी हो जाएंगे और रूस की सुरक्षा खतरे में पड़ जाएगी। इसीलिए रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन को यूक्रेन का नाटो में शामिल होना कतई मंजूर नहीं है। वे इसका पुरजोर विरोध करते रहे हैं। रूस यह भी जानता है कि यूक्रेन के नाटो में शामिल हो जाने के बाद, अगर वह यूक्रेन पर हमला करता तो नाटो समझौते के तहत बाकी 30 देश उसे अपने खिलाफ हमला मानकर रूस पर जवाबी कर्रवाई करेंगे। असल में नाटो का जन्म ही रूस या सोवियत संघ से निपटने के लिए हुआ था। इसीलिए पुतिन यूक्रेन के नाटो में शामिल न होने की गारंटी मांग रहे हैं।

दूसरी ओर यूक्रेन नाटो में इसलिए शामिल होना चाहता है, क्योंकि वह जानता है कि अपने दम पर वह कभी भी रूस का मुकाबला नहीं कर पाएगा। उसके पास न तो रूस जैसी बड़ी सेना है और न ही रूस की तरह अत्याधुनिक हथियार। साल 2014 में रूस ने यूक्रेन के एक हिस्से क्रीमिया पर अपना कब्जा जमा लिया था और उसे रूस में मिला लिया था। यूक्रेन को डर इस बात का है कि अगर उसने समय रहते जरूरी कदम नहीं उठाया, तो रूस एक-एक करके यूक्रेन के सभी हिस्सों पर कब्जा कर लेगा। यही वजह है कि यूक्रेन अब नाटो जैसे शक्तिशाली सैन्य गठबंधन का हिस्सा बनना चाहता है, जिससे उसकी आजादी सुरक्षित रह सके।

यूक्रेन और रूस के रिश्ते काफी जटिल रहे हैं। यूक्रेन के बड़े भाग के लोग स्वतंत्र रहना चाहते हैं, लेकिन पूर्वी यूके्रन के लोगों की मांग है कि उनके देश को रूस के प्रति वफादार रहना चाहिए। इस कारण यूक्रेन की राजनीति भी दो खेमों में बंटी हैं। एक पक्ष खुले तौर पर रूस का समर्थन करता है तो दूसरा पश्चिमी देशों का समर्थन करता है। यूक्रेन का डोनबास क्षेत्र पूरी तरह से रूस समर्थित क्षेत्र है। रूस ने पूर्वी यूक्रेन के डोनेत्सक और लुहांस्क को स्वतंत्र देश की मान्यता भी दे दी है।

भारत की दुविधा

वास्तव में यूक्रेन और रूस की यह जंग दो सुपर पावर देश अमेरिका और रूस के बीच की जंग है। भारत के सामने इस समय विकट स्थिति यह है कि अमेरिका और रूस दोनों ही उसके महत्वपूर्ण सामरिक मित्र हैं। रूस भारत का बहुत पुराना भरोसेमंद मित्र और सबसे बड़ा डिफेंस पार्टनर है। भारत अभी भी अपने लगभग 65 फीसदी हथियार रूस से खरीदता है। वहीं अमेरिका के साथ भी भारत के रिश्ते पिछले डेढ़ दशक में मजबूत हुए हैं। इसके साथ ही यह भी महत्वपूर्ण है कि एशिया के जिस देश में यूक्रेन ने सबसे पहले अपना दूतावास खोला था, वह भारत ही था।

इस तरह भारत का यूक्रेन के साथ भी मजबूत व्यापारिक और रणनीतिक रिश्ता है। मतलब, भारत इनमें से किसी भी देश के खिलाफ नहीं जाना चाहता और न ही उनसे अपने रिश्ते खराब करना चाहता है।

भारत की नीति सदा से शांतिपूर्ण कदम उठाने की रही है और वह यही चाहता है कि रूस-यूक्रेन विवाद का युद्ध की बजाय कूटनीतिक और शांतिपूर्ण हल खोजा जाए।

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