पाक में क्यों इतनी अस्थिरता?

— रंजना मिश्रा

1947 के विभाजन के बाद पाकिस्तान को अस्तित्व में आए हुए 75 साल हो चुके हैं, लेकिन वहां आज तक कोई भी सरकार अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाई। हाल में ही इमरान खान ने भी अपनी सत्ता 5 साल से पहले ही खो दी। पाक की इस राजनीतिक अस्थिरता के कई कारण हैं, जिसमें सबसे बड़ा कारण राजनीति में सेना का दखल और देश की जनता का सरकारी संस्थानों पर विश्वास न होना है। इसके अलावा बेरोजगारी, मुद्रास्फीति और घटता विदेशी मुद्रा भंडार भी इसके अन्य प्रमुख कारण है।

लोकतंत्र बना मजाक

पाकिस्तान में अब तक 22 प्रधानमंत्री बन चुके हैं। इस देश के 75 साल के इतिहास में सिर्फ 37 वर्ष जनतांत्रिक सरकारें रहीं, 32 वर्ष सेना ने सीधे शासन किया और तकरीबन 8 वर्षों तक यहां राष्ट्रपति शासन रहा। पाकिस्तान में सरकार चाहे किसी की भी हो, लेकिन शासन वहां अप्रत्यक्ष रूप से सेना का ही रहता है। वहां लोकतंत्र स्थापित करने की थोड़ी बहुत कोशिशें हुईं, लेकिन वो कभी अपनी जड़ें मजबूत नहीं कर पाया। 1947 से 16 अक्टूबर 1951 तक पाकिस्तान के पहले प्रधानमंत्री रहे लियाकत अली खान की एक रैली के दौरान गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। तब तक उनका कार्यकाल 4 साल 63 दिन का पूरा हुआ था। इस देश में किसी प्रधानमंत्री का यह दूसरा सबसे लंबा कार्यकाल रहा है। इस सूची में पहले नंबर पर यूसुफ रजा गिलानी हैं, जो 2008-2012 के बीच 4 साल 86 दिन तक प्रधानमंत्री रहे। सेना के लंबे शासन के बाद  1973 में जुल्फिकार अली भुट्टो बहुमत से जीतकर सत्ता में आए और प्रधानमंत्री बने, लेकिन वे भी अपना कार्यकाल 5 साल तक पूरा न कर सके, क्योंकि पाकिस्तानी सेना के तत्कालीन प्रमुख जनरल जिया उल हक ने तख्तापलट करके उनकी सरकार गिरा दी। उसके बाद जनरल जिया उल हक खुद पाकिस्तान के राष्ट्रपति बन गए और जुल्फिकार अली भुट्टो को जेल में डाल दिया गया। 4 अप्रैल 1979 को उन्हें देशद्रोह के आरोप में फांसी दे दी गई। जनरल जिया उल हक 1988 तक राष्ट्रपति रहे, लेकिन उनकी मौत भी एक विमान दुर्घटना में बड़ी रहस्यमयी परिस्थितियों में हुई।

इस घटना के बाद पाकिस्तान में लोकतंत्र की फिर से बहाली हुई, लेकिन उसके बाद भी वहां कोई प्रधानमंत्री 5 साल का कार्यकाल पूरा नहीं कर पाया। नवाज शरीफ पाकिस्तान के प्रधानमंत्री एक नहीं बल्कि तीन बार बने। मगर कभी लगातार 5 साल तक सरकार नहीं चला पाए। दिलचस्प बात यह है कि 1998 में तत्कालीन प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने जनरल परवेज मुशर्रफ को सेना प्रमुख नियुक्त किया, लेकिन इसके 1 साल के बाद ही जनरल परवेज मुशर्रफ ने तख्तापलट कर दिया और नवाज शरीफ को जेल में डाल दिया। इसके बाद जनरल परवेज मुशर्रफ खुद राष्ट्रपति बन गए। इतना ही नहीं नवाज शरीफ को भ्रष्टाचार और अपहरण के मामले में फांसी की सजा सुना दी गई। हालांकि सऊदी अरब के हस्तक्षेप के बाद बड़ी मुश्किल से नवाज शरीफ की फांसी की सजा माफ की गई। 2013 में नवाज शरीफ जब फिर से सत्ता में आए तो उन्होंने वही सलूक जनरल परवेज मुशर्रफ के साथ किया। पाकिस्तान के संविधान को नुकसान पहुंचाने के लिए उन पर मुकदमा चलाया गया और इस मामले में उन्हें फांसी की सजा भी दी गई, लेकिन बाद में फांसी तो माफ हो गई पर जनरल को पाकिस्तान छोडक़र भागना पड़ा। आजकल वो दुबई में रहते हैं। यानी नवाज शरीफ ने अपना पूरा हिसाब बराबर कर लिया। नवाज शरीफ इस समय लंदन में रहते हैं, लेकिन संभावना है कि वह अब जल्द ही पाकिस्तान लौट आएंगे और देश की नई सरकार में अहम भूमिका निभाएंगे। इमरान खान ने सत्ता में आने के बाद नवाज शरीफ को भी जेल में डाल दिया था। जब नवाज शरीफ बीमार हो गए तो बड़ी मुश्किल से इलाज के नाम पर लंदन जाकर अपनी जान बचाई। तब इमरान खान हाथ मलकर रह गए और कहा कि नवाज शरीफ पूरे देश को बेवकूफ बनाकर, झूठ बोलकर, अपनी सजा से बचने के लिए भाग गए।

शहबाज भी अस्थिर मुखिया

पाकिस्तान की संसद (नेशनल असेंबली) ने अब नवाज के भाई शहबाज शरीफ को देश का 23वां प्रधानमंत्री चुना है। 70 वर्षीय शाहबाज शरीफ, नवाज शरीफ के छोटे भाई हैं। राजनीति में आने से पहले उनकी पहचान पाकिस्तान के एक बड़े कारोबारी के रूप में रही है। वर्ष 1988 में वे अपने बिजनेस के साथ-साथ राजनीति में भी आ गए और वर्ष 1997 में पहली बार पंजाब सूबे के मुख्यमंत्री बने। हालांकि इस दौरान वह भी बतौर मुख्यमंत्री अपना 5 साल का कार्यकाल पूरा नहीं कर पाए। बाद में वर्ष 2008 और फिर 2013 में वह फिर से पंजाब प्रांत के मुख्यमंत्री बने और 2013 से उन्होंने पूरे 5 साल तक पंजाब सूबे में सरकार चलाई। इस दौरान जिस प्रकार से नवाज शरीफ पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे थे, उसी तरह शहबाज शरीफ पर भी भ्रष्टाचार के आरोप लगे। उनका नाम पनामा पेपर्स लीक में भी आया। 2019 में मनी लांड्रिंग के एक मामले में इमरान खान की सरकार ने पाकिस्तान में उनकी 23 संपत्तियों को जब्त कर लिया था। इसलिए संभावना है कि शहबाज शरीफ भी अब प्रधानमंत्री बनने के बाद इमरान खान के खिलाफ इसी तरह की कार्यवाही कर सकते हैं। क्योंकि वहां शासन करने की यही परंपरा रही है।

अब सवाल यह है कि क्या पाकिस्तान में इमरान सरकार को सत्ता से बेदखल करने के बाद विपक्षी एकजुटता कायम रह सकेगी? शाहबाज शरीफ के सामने कई चुनौतियां आने वाली हैं। उन्हें सबसे पहले धुर विरोधियों को एकजुट रखना होगा। क्योंकि उनके नेतृत्व वाले गठबंधन में धुर विरोधी पार्टियां एक साथ हैं। जैसे शहबाज की ही पाकिस्तान मुस्लिम लीग-नवाज और पूर्व राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी की पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (पीपीपी), ये दोनों पार्टियां दशकों से पाकिस्तान की राजनीति में एक दूसरे के खिलाफ रही हैं। इसके अलावा संयुक्त विपक्षी दलों में कुछ उग्र विचारों वाले राजनीतिक दल भी शामिल हैं, जिनसे तालमेल बिठाना मुश्किल होगा। ऐसे में विभिन्न विचारों वाले संयुक्त गठबंधन में एकता रह पाना बहुत मुश्किल है। वे एक साथ कितने दिन सरकार चला पाएंगे, यह एक बड़ा सवाल है।

आर्थिक तंगी चरम पर

इस समय पाकिस्तानी अर्थव्यवस्था पूरी तरह चरमराई हुई है। वहां मुद्रास्फीति दक्षिण एशिया के किसी भी देश की तुलना में सबसे अधिक है और महंगाई चरम पर है। जिससे नागरिकों को अपनी जरूरतें पूरा करने के लिए भी काफी संघर्ष करना पड़ रहा है। पाकिस्तानी मुद्रा के हिसाब से एक अमेरिकी डॉलर का मूल्य 190 रुपए से अधिक हो गया है। इसके लिए इमरान खान सरकार की नीतियों को दोषी ठहराया जा रहा है। कई दशकों के बाद उनके कार्यकाल में देश की आय में भारी गिरावट देखी गई। अर्थव्यवस्था में मंदी के साथ देश में पहली बार साल 2019 में विकास की नकारात्मक दर दर्ज की गई। इमरान खान की विदेश नीति पर भी सवाल उठाए जाते रहे हैं। चीन और रूस के साथ पाकिस्तान की नीति और दूसरी ओर अमेरिका को लेकर इमरान खान के रवैए की विपक्षी पार्टियों ने जमकर आलोचना की है। पाकिस्तान को दशकों से अमेरिका से वित्तीय मदद मिलती रही है, लेकिन अब वह भी बंद हो गई है। ऐसे में शाहबाज शरीफ के सामने यह भी चुनौती है कि क्या वे फिर से अमेरिका से मदद लेने में सफल हो पाएंगे? इमरान खान ने सरकार में आने से पहले चुनावी भाषणों में देश को कर्ज मुक्त कराने का वादा किया था, लेकिन उनके प्रधानमंत्री बनने के बाद तो देश और कर्ज में डूबता चला गया।

पाकिस्तान के ऊपर अभी लगभग 51.724 ट्रिलियन पाकिस्तानी रुपए का कर्ज है, जो अब तक का सर्वाधिक कर्ज है। पाकिस्तान की खस्ता आर्थिक हालत को सुधारने के लिए इमरान खान ने अपने शासनकाल में चीन से नजदीकियां बढ़ाईं और अब पाकिस्तान चीन के जाल में बुरी तरह फंस चुका है। चीन तो कई देशों को अपने कर्ज के जाल में फंसा कर वहां कब्जा करने की चाल चलता ही रहा है और यही उसने पाकिस्तान के साथ भी किया है। पाकिस्तान हमेशा से आतंकवाद को बढ़ावा देता रहा है और इसीलिए अब उसकी छवि पूरे विश्व में एक आतंकी देश के रूप में बन गई है, जिसकी वजह से कई देशों ने उससे दूरी बना ली है। अब देखना यह है कि शाहबाज शरीफ क्या पाकिस्तान की सेहत और सूरत बदलने में कामयाब हो पाएंगे?

कट्टरपंथ की जकडऩ

आज तक पाकिस्तान में सरकार चाहे जिसकी भी रही हो, वो न तो आतंकवाद को समर्थन देना छोड़ती है और न ही इस्लामिक कट्टरवाद से पीछे हटती है। सत्ता में आते ही हर प्रधानमंत्री कश्मीर का राग अलापना शुरू कर देता है। भारत का विरोध पाकिस्तान का प्रमुख एजेंडा रहा है। जब तक पाकिस्तान अपनी नीतियों में बदलाव नहीं लाएगा, देश के आर्थिक विकास पर ध्यान देने की बजाय आतंकवाद पर ध्यान केंद्रित रखेगा, जब तक पाकिस्तान में सही रूप से लोकतांत्रिक व्यवस्था कायम नहीं होगी और जब तक वह आर्थिक रूप से विदेशी संस्थाओं पर निर्भर रहेगा, तब तक वहां की राजनीतिक अस्थिरता दूर होना लगभग असंभव है। यह भी सोचने की बात है कि जिस देश का प्रधानमंत्री ही भ्रष्टाचार के आरोपों में इस कदर घिरा हो, वो भला जनता को बेईमानी और भ्रष्टाचार करने से कैसे रोकेगा?

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