सबसे पुरानी शाही ट्रेन का ‘मजबूरन’ निजीकरण

रेलवे की शुद्ध कमाई की सोच, देश की सबसे पुरानी शाही ट्रेन के संचालन पर भारी पड़ रही है। राजस्थान पर्यटन विकास निगम (आरटीडीसी) द्वारा संचालित शाही ट्रेन—पैलेस ऑन व्हील्स, को सितम्बर माह से चलाया जाना प्रस्तावित है। मगर रेलवे के भारी-भरकम चार्जेज आड़े आ रहे हैं। ऐसे में आरटीडीसी को यह ट्रेन निजी हाथों में सौंपने को मजबूर होना पड़रहा है।

आरटीडीसी के अध्यक्ष धर्मेन्द्र राठौड़ ने ‘प्रेसवाणी’ को बताया कि पैलेस ऑन व्हील्स का संचालन 1982 से 2020 में कोरोनाकाल की शुरूआत तक लगातार किया गया है। यह देश की पहली शाही ट्रेन है। इसमें सफर का क्रेज जितना भारत में है, उससे कहीं ज्यादा विदेशों में है। यही कारण है कि ट्रेन का करीब 90 फीसदी यात्री भार विदेशी सैलानियों का होता है। इसमें भी अधिकतर अमरीका और ब्रिटेन जैसे अमीर देशों के सैलानी होते हैं।

राठौड़ के अनुसार विदेशियों की ज्यादा संख्या की बड़ी वजह इस शाही ट्रेन का किराया है। इसमें प्रति यात्री 3.50 लाख रु. औऱ पति-पत्नी के 7 लाख रु. चार्ज किए जाते हैं। सात दिन का पैकेज टूर होने से एक दिन का किराया एक लाख रुपए पड़ता है। इतना मंहगा किराया देकर पैलेस ऑन व्हील्स में शाही सफर का आनंद भारतीय कम ही लेते हैं।

सिर्फ पैसे से मतलब

रेलवे की शुद्ध व्यावसायिक सोच की चर्चा करते हुए राठौड़ ने बताया कि केन्द्र सरकार भारत गौरव यात्रा-योजना के तहत नई नीति लेकर आई है। इस नीति में निजीकरण को बढावा देने का पूरा इंतजाम किया गया है। रेलवे नई नीति के अनुरूप ही आऱटीडीसी से भी समझौता करने का दबाव बना रहा है। समझौते की शर्तें इतनी भारी हैं कि निगम को पैलेस ऑन व्हील्स भी निजी हाथों में सौपने को मजबूर होना पड़ रहा है।

आरटीडीसी अध्यक्ष के अनुसार रेलवे पैलेस ऑन व्हील्स के संचालन के लिए 4 करोड़ 23 लाख रु. प्रति वर्ष मांग रहा है। ये एक प्रकार से पगड़ी वसूलने जैसा है।ट्रेन चले या न चले, रेलवे को यह राशि देनी ही पडेगी। इसके अलावा उसे 90 लाख रुपए (प्रति फेरा) हॉलेज चार्ज देना होगा। ट्रेन के कुल सलाना फेरों के हिसाब से यह राशि 28 करोड़/साल होती है। राठौड़ ने बताया कि पहले रेलवे औऱ आऱटीडीसी ‘प्रॉफिट शेयरिंग’ के आधार पर पैलेस ऑन व्हील्स का संचालन कर रहे थे। इसमें मुनाफे का 56 फीसदी हिस्सा रेलवे को जाता था, जबकि 44 फीसदी आऱटीडीसी को मिलता था। पहले हॉलेज चार्ज भी प्रति फेरा 65 लाख रुपए ही था, जिसे अब बढाकर 90 लाख किया जा रहा है।

नहीं माना अनुरोध

राठौड़ ने कहा कि हमने दिल्ली जाकर रेलमंत्री अश्विनी वैष्णव तथा रेलवे के उच्चाधिकारियों के साथ बैठक कर यह समझाने की कोशिश करी कि पिछले दो साल कोरोना की वजह से पैलेस ऑन व्हील्स नहीं चलाई जा सकी है। यह शाही ट्रेन आऱटीडीसी की आमदनी का प्रमुख स्रोत है। अब यदि रेलवे भारी वसूली करता है तो निगम पर आर्थिक दबाव बढेगा। राठौड़ बताते हैं कि हमने रेलमंत्री से पैलेस ऑन व्हील्स को विशेष दर्जा देकरपुरानी व्यवस्था ही लागू रखने का अनुरोध किया था।किंतुरेल अधिकारियों के रुख में किसी प्रकार के बदलाव के संकेत नहीं मिले। आगे की योजना के बारे में राठौड़ ने बताया कि रेलवे के रुख को देखते हुए हमारे पास दो विकल्प बचे हैं। एक तो, हम इस साल भी यह शाही ट्रेन न चलाएं। दूसरा, इसका संचालन निजी हाथों में सौंप दें। इसके लिए निगम ने प्रस्ताव पास कर राज्य सरकार को भेज दिया है। वहां से हरी झंडी मिलते ही पैलेस ऑन व्हील्स के निजीकरण की प्रक्रिया शुरू कर दी जाएगी। टेंडर की शर्तों पर विचार किया जा रहा है। जून माह में टेंडर आमंत्रित किए जा सकते हैं।उन्होंने संकेत दिया कि पैलेस ऑन व्हील्स का संचालन निजी कंपनी को दिए जाने से इसके किराए में बढोत्तरी हो सकती है।   

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