संतान के लिए कैदी को पैरोल पर होगा विचार

सुप्रीम कोर्ट संतान पैदा करने के लिए कैदी को पैरोल दिए जाने पर विचार करेगा। राजस्थान हाईकोर्ट द्वारा एक कैदी को संतान पैदा करने के लिए 15 दिनों की पैरोल देने के फैसले को शीर्ष कोर्ट में चुनौती दी गई है, जिस पर अगले हफ्ते सुनवाई हो सकती है।

इस साल अप्रैल में एक कैदी की पत्नी ने अपने ‘संतान पैदा करने के अधिकार’ का जिक्र करते हुए राजस्थान हाईकोर्ट की जोधपुर पीठ से पति की रिहाई की मांग की थी। उच्च न्यायालय के जस्टिस संदीप मेहता और फरजंद अली ने कहा कि पति के जेल में रहने के कारण कैदी की पत्नी की शारीरिक और भावनात्मक जरूरतें प्रभावित हुई हैं। इसी आधार पर अदालत ने उम्रकैद की सजा काट रहे 34 साल के नंदलाल की 15 दिनों की पैरोल मंजूर की थी।

भीलवाड़ा की एक अदालत द्वारा दोषी ठहराए जाने के बाद नंदलाल अजमेर सेंट्रल जेल में बंद है। उसकी पत्नी ने जिला कलेक्टर और पैरोल कमेटी के चेयरमैन से अपील कि कि वह कैदी की वैध पत्नी है और उनकी कोई संतान नहीं है। इसलिए उसके पति को पैरोल पर जेल से बाहर आने देना चाहिए, जिससे वह संतान सुख प्राप्त कर सके। महिला ने इसके लिए अपने पति के जेल में रहने के दौरान ‘अच्छे व्यवहार’ का भी हवाला दिया था। उसका आवेदन कलेक्टर ऑफिस में पेंडिंग था। मामले की जल्द सुनवाई के लिए विवाहिता राजस्थान हाईकोर्ट की जोधपुर पीठ पहुंच गई।

महिला की याचिका पर सुनवाई करते हुए राजस्थान हाईकोर्ट की जोधपुर पीठ ने अपने फैसले में कहा कि कैदी की पत्नी बच्चे के अधिकार से वंचित रही है, जबकि न तो उसने कोई अपराध किया है और न ही उसे कोई सजा मिली है। अदालत ने कहा, वंश संरक्षण के उद्देश्य से बच्चा पैदा करने को धार्मिक ग्रंथों, भारतीय संस्कृति और अलग.अलग न्यायिक फैसलों में भी माना गया है। बच्चा होने से कैदी पर भी सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। पैरोल देने का मकसद यह भी है कि अपनी रिहाई के बाद कैदी शांतिपूर्ण तरीके से समाज की मुख्यधारा में शामिल हो पाएगा।

हाईकोर्ट ने हिंदू धर्म के 16 संस्कारों का जिक्र किया, जिसमें गर्भधारण को भी एक संस्कार बताया गया है। अदालत ने कहा, हिंदू दर्शन में चार पुरुषार्थ हैं। धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष। जब एक कैदी जेल में होता है तो वह इन पुरुषार्थों से वंचित हो जाता है। इनमें से तीन पुरुषार्थ धर्म, अर्थ और मोक्ष अकेले हासिल किये जा सकते हैं, लेकिन काम ऐसा हिस्सा है जो शादी होने के बाद पति-पत्नी पर निर्भर करता है। ऐसी स्थिति में कैदी की निर्दोष पत्नी इससे वंचित होती है। शादीशुदा महिला मां बनना चाहती है, तो उसकी यह इच्छा पूरी करने में राज्य की जिम्मेदारी काफी महत्वपूर्ण हो जाती है।

अदालत ने अपने फैसले में कहा कि मां बनने पर महिला का स्त्रीत्व और निखर जाता है। परिवार और समाज में उसकी प्रतिष्ठा बढ़ जाती है। महिला के लिए जीवन में ऐसी स्थिति नहीं होनी चाहिए कि बिना उसकी गलती के वह अपने पति से कोई बच्चा पैदा न कर पाए। इस तरह अदालत ने कैदी नंदलाल को 15 दिन की पैरोल दी। राजस्थान हाईकोर्ट की जोधपुर पीठ ने ‘संतान पैदा करने के अधिकार’ को संविधान के अनुच्छेद-21 के तहत दिए गए ‘जीवन के अधिकार’ से भी जोड़ा था। उसने कहा था कि संविधान गारंटी देता है कि किसी व्यक्ति को उसकी जिंदगी और व्यक्तिगत स्वतंत्रता से वंचित नहीं किया जा सकता है। इसलिए दोषी कैदी के पति या पत्नी को संतान की चाहत से नहीं रोका जा सकता है।

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