बिलकिस कांडः दोषियों की रिहाई पर उठी उंगलियां

गुजरात में चर्चित बिलकिस बानो गैंगरेप कांड के सभी दोषियों की रिहाई का मामला तूल पकड़ता जा रहा है। राज्य सरकार ने इन 11 दोषियों को आजादी के अमृत महोत्सव के तहत कैदियों की रिहाई के केन्द्र के फैसले की आड़ लेते हुए जेल से छोड़ा है। गत जून माह में केंद्र सरकार ने दोषी कैदियों को जेल से रिहा करने के मकसद से राज्य सरकारों के लिए एक गाइडलाइन जारी की थी। किंतु इस गाइडलाइन में रेप के दोषी समय से पहले जेल से रिहाई के हकदार नहीं थे।

अब गुजरात के अतिरिक्त मुख्य गृहसचिव राजकुमार सरकार के फैसले की सफाई में कहते हैं कि सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार से उस समय की रेमिशन पॉलिसी यानी समय से पहले जेल से रिहा करने की नीति के तहत इन 11 दोषियों की जल्द रिहाई पर विचर करने के लिए कहा था, जिस समय उन्हें ट्रायल कोर्ट ने सजा सुनाई गई थी।

इन सभी दोषियों को मुंबई की स्पेशल सीबीआई कोर्ट ने 2008 में उम्रकैद की सजा सुनाई थी। उस समय गुजरात में 1992 की रेमिशन पॉलिसी लागू थी। इस पॉलिसी में रेप के दोषियों को समय पहले न छोड़े जाने की बात नहीं थी। यही वो बात है जो गुजरात सरकार के इस फैसले पर सफाई देने उतरे अतिरिक्त मुख्य सचिव-गृह राजकुमार ने कही है।

अतिरिक्त मुख्य सचिव ने दावा है कि सुप्रीम कोर्ट ने 1992 की रेमिशन पॉलिसी के तहत इन 11 कैदियों को समय से पहले जेल से छोड़ने की अपील पर विचार करने को कहा था। अतिरिक्त मुख्य गृह सचिव राजकुमार ने कहा कि अमृत महोत्सव वाली केंद्र की रेमिशन पॉलिसी बिलकिस बानो केस पर लागू नहीं होती, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार से 1992 की पॉलिसी के तहत विचार करने को कहा था।

हालांकि, 2012 के एक मामले में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि उम्रकैद का मतलब होता है उम्र भर की कैद। जस्टिस केएस राधाकृष्णन और जस्टिस मदन बी लोकुर की बेंच ने कहा था कि ऐसा लगता है कि एक गलत धारणा यह बना रही है कि आजीवन कारावास की सजा काट रहे कैदी को 14 या 20 साल की कैद पूरी होने पर रिहा होने का अधिकार है। कैदी को ऐसा कोई अधिकार नहीं है। उम्रकैद या आजीवन सजा काट रहे दोषी को अपने जीवन के अंत तक हिरासत में रहना होता है। उम्रकैद की सजा पूरी होने से पहले दोषी संबंधित सरकार की किसी छूट या रिमिशन से रिहा हो सकता है, लेकिन संबंधित सरकार उम्रकैद की सजा को 14 साल से पहले नहीं घटा सकती है।

इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के एक वरिष्ठ वकील विराग गुप्ता के कहते हैं कि उम्रकैद का मतलब आजीवन कारावास होता है और इसे सिर्फ 14 साल जेल की सजा मानने की धारणा गलत है। अदालत अपराध के अनुसार सजा सुनाती है। इसमें उम्रकैद या मौत तक जेल की सजा भी शामिल होती है।

ज्ञात हो कि 28 फरवरी 2002 को गुजरात दंगा शुरू हुआ तो 5 महीने की गर्भवती बिलकिस बानो अपने परिवार के साथ एक खेत में जा छिपी थीं। बिलकिस के साथ उसके परिवार के 15 और लोग थे। 3 मार्च, 2002 को हाथ में लाठी डंडा और तलवार लिए 20-30 लोग वहां पहुंच गए। इन लोगों ने न सिर्फ बिलकिस के परिवार के 7 लोगों की बेरहमी से हत्या कर दी, बल्कि एक-एक कर कई लोगों ने बिलकिस के साथ रेप भी किया।

बिलकिस जब न्याय के लिए सुप्रीम कोर्ट पहुंचीं तो कोर्ट ने इस मामले को सीबीआई के पास ट्रांसफर करने का फैसला किया। घटना के करीब 2 साल बाद 2004 में इस मामले से जुड़े आरोपियों को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया। अहमदाबाद में ट्रायल शुरू होते ही बिलकिस सुप्रीम कोर्ट पहुंचीं और केस अहमदाबाद से मुंबई ट्रांसफर करने की अपील की। अगस्त 2004 में केस मुंबई ट्रांसफर कर दिया गया।

21 जनवरी 2008 को सीबीआई की विशेष अदालत ने 11 दोषियों को उम्रकैद की सजा सुनाई। 7 दोषियों को सबूत के आभाव में बरी कर दिया गया और ट्रायल के दौरान ही एक आरोपी की मौत हो गई। इस अदालत के फैसले को 2018 में बॉम्बे हाई कोर्ट ने भी बरकरार रखा था। अप्रैल 2019 में सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात सरकार को बिलकिस बानो को 50 लाख रुपए मुआवजा, नौकरी और घर देने का आदेश दिया था।

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